Tuesday, 22 October 2013

करवा का व्रत - स्व. यशपाल

मित्रो!  करवा चौथ का व्रत आज स्त्री विमर्श व बहस का बहुत बड़ा मुद्दा बना हुआ है, आज बीच - बहस में प्रस्तुत है, प्रख्यात प्रगतिशील कथाकार स्व.यशपाल की इसी मुद्दे पर लिखी चर्चित सर्वकालिक सम सामयिक कहानी

करवा का व्रत - स्व. यशपाल


कन्हैयालाल अपने दफ्तर के हमजोलियों और मित्रों से दो तीन बरस बड़ा ही था, परन्तु ब्याह उसका उन लोगों के बाद हुआ। उसके बहुत अनुरोध करने पर भी साहब ने उसे ब्याह के लिए सप्ताह-भर से अधिक छुट्टी न दी थी। लौटा तो उसके अंतरंग मित्रों ने भी उससे वही प्रश्न पूछे जो प्रायः ऐसे अवसर पर दूसरों से पूछे जाते हैं और फिर वही परामर्श उसे दिये गये जो अनुभवी लोग नवविवाहितों को दिया करते हैं।

हेमराज को कन्हैयालाल समझदार मानता था। हेमराज ने समझाया-बहू को प्यार तो करना ही चाहिए, पर प्यार से उसे बिगाड़ देना या सिर चढ़ा लेना भी ठीक नहीं। औरत सरकश हो जाती है, तो आदमी को उम्रभर जोरू का गुलाम ही बना रहना पड़ता है। उसकी ज़रूरतें पूरी करो, पर रखो अपने काबू में। मार-पीट बुरी बात है, पर यह भी नहीं कि औरत को मर्द का डर ही न रहे। डर उसे ज़रूर रहना चाहिए... मारे नहीं तो कम-से-कम गुर्रा तो ज़रूर दे। तीन बात उसकी मानो तो एक में ना भी कर दो। यह न समझ ले कि जो चाहे कर या करा सकती है। उसे तुम्हारी खुशी-नाराजगी की परवाह रहे। हमारे साहब जैसा हाल न हो जाये। ...मैं तो देखकर हैरान हो गया। एम्पोरियम से कुछ चीज़ें लेने के लिये जा रहे थे तो घरवाली को पुकारकर पैसे लिये। बीवी ने कह दिया- ''कालीन इस महीने रहने दो। अगले महीने सही'', तो भीगी बिल्ली की तरह बोले, ''अच्छा!'' मर्द को रुपया-पैसा तो अपने पास में रखना चाहिए। मालिक तो मर्द है।
कन्हैया के विवाह के समय नक्षत्रों का योग ऐसा था कि ससुराल वाले लड़की की विदाई कराने के लिए किसी तरह तैयार नहीं हुए। अधिक छुट्टी नहीं थी इसलिए गौने की बात ' फिर' पर ही टल गई थी। एक तरह से अच्छा ही हुआ। हेमराज ने कन्हैया को लिखा-पढ़ा दिया कि पहले तुम ऐसा मत करना कि वह समझे कि तुम उसके बिना रह नहीं सकते, या बहुत खुशामद करने लगो।...अपनी मर्जी रखना, समझे। औरत और बिल्ली की जात एक। पहले दिन के व्यवहार का असर उस पर सदा रहता है। तभी तो कहते हैं कि ' गुर्बारा वररोजे अव्वल कुश्तन'- बिल्ली के आते ही पहले दिन हाथ लगा दे तो फिर रास्ता नहीं पकड़ती। ...तुम कहते हो, पढ़ी-लिखी है, तो तुम्हें और भी चौकस रहना चाहिए। पढ़ी-लिखी यों भी मिजाज दिखाती है।
निस्वार्थ-भाव से हेमराज की दी हुई सीख कन्हैया ने पल्ले बाँध ली थी। सोचा- मुझे बाजार-होटल में खाना पड़े या खुद चौका-बर्तन करना पड़े, तो शादी का लाभ क्या? इसलिए वह लाजो को दिल्ली ले आया था। दिल्ली में सबसे बड़ी दिक्कत मकान की होती है। रेलवे में काम करने वाले, कन्हैया के ज़िले के बाबू ने उसे अपने क्वार्टर का एक कमरा और रसोई की जगह सस्ते किराए पर दे दी थी। सो सवा साल से मजे में चल रहा था।
लाजवंती अलीगढ़ में आठवीं जमात तक पढ़ी थी। बहुत-सी चीजों के शौक थे। कई ऐसी चीजों के भी जिन्हें दूसरे घरों की लड़कियों को या नई ब्याही बहुओं को करते देख मन मारकर रह जाना पड़ता था। उसके पिता और बड़े भाई पुराने ख्याल के थे। सोचती थी, ब्याह के बाद सही। उन चीजों के लिए कन्हैया से कहती। लाजो के कहने का ढंग कुछ ऐसा था कि कन्हैया का दिल इनकार करने को न करता, पर इस ख्याल से कि वह बहुत सरकश न हो जाए, दो बात मानकर तीसरी पर इनकार भी कर देता। लाजो मुँह फुला लेती। लाजो मुँह फुलाती तो सोचती कि मनायेंगे तो मान जाऊँगी, आखिर तो मनायेंगे ही। पर कन्हैया मनाने की अपेक्षा डाँट ही देता। एक-आध बार उसने थप्पड़ भी चला दिया। मनौती की प्रतीक्षा में जब थप्पड़ पड़ जाता तो दिल कटकर रह जाता और लाजो अकेले में फूट-फूटकर रोती। फिर उसने सोच लिया- ' चलो, किस्मत में यही है तो क्या हो सकता है?' वह हार मानकर खुद ही बोल पड़ती।
कन्हैया का हाथ पहली दो बार तो क्रोध की बेबसी में ही चला था, जब चल गया तो उसे अपने अधिकार और शक्ति का अनुभव होने लगा। अपनी शक्ति अनुभव करने के नशे से बड़ा नशा दूसरा कौन होगा ? इस नशे में राजा देश-पर-देश समेटते जाते थे, जमींदार गाँव-पर-गाँव और सेठ मिल और बैंक खरीदते चले जाते हैं। इस नशे की सीमा नहीं। यह चस्का पड़ा तो कन्हैया के हाथ उतना क्रोध आने की प्रतीक्षा किए बिना भी चल जाते।
मार से लाजो को शारीरिक पीड़ा तो होती ही थी, पर उससे अधिक होती थी अपमान की पीड़ा। ऐसा होने पर वह कई दिनों के लिए उदास हो जाती। घर का सब काम करती। बुलाने पर उत्तर भी दे देती। इच्छा न होने पर भी कन्हैया की इच्छा का विरोध न करती, पर मन-ही-मन सोचती रहती, इससे तो अच्छा है मर जाऊँ। और फिर समय पीड़ा को कम कर देता। जीवन था तो हँसने और खुश होने की इच्छा भी फूट ही पड़ती और लाजो हँसने लगती। सोच यह लिया था, ' मेरा पति है, जैसा भी है मेरे लिए तो यही सब कुछ है। जैसे यह चाहता है, वैसे ही मैं चलूँ।' लाजो के सब तरह अधीन हो जाने पर भी कन्हैया की तेजी बढ़ती ही जा रही थी। वह जितनी अधिक बेपरवाही और स्वच्छंदता लाजो के प्रति दिखा सकता, अपने मन में उसे उतना ही अधिक अपनी समझने और प्यार का संतोष पाता।
क्वार के अन्त में पड़ोस की स्त्रियाँ करवा चौथ के व्रत की बात करने लगीं। एक-दूसरे को बता रही थीं कि उनके मायके से करवे में क्या आया। पहले बरस लाजो का भाई आकर करवा दे गया था। इस बरस भी वह प्रतीक्षा में थी। जिनके मायके शहर से दूर थे, उनके यहाँ मायके से रुपए आ गए थे। कन्हैया अपनी चिट्ठी-पत्री दफ्तर के पते से ही मँगाता था। दफ्तर से आकर उसने बताया, ' तुम्हारे भाई ने करवे के दो रुपए भेजे हैं।'
करवे के रुपए आ जाने से ही लाजो को संतोष हो गया। सोचा, भैया इतनी दूर कैसे आते? कन्हैया दफ्तर जा रहा था तो उसने अभिमान से गर्दन कन्धे पर टेढ़ी कर और लाड़ के स्वर में याद दिलाया- ' हमारे लिए सरघी में क्या-क्या लाओगे...?'
और लाजो ने ऐसे अवसर पर लाई जाने वाली चीज़ें याद दिला दीं। लाजो पड़ोस में कह आई कि उसने भी सरघी का सामान मँगाया है। करवा चौथ का व्रत भला कौन हिन्दू स्त्री नहीं करती? जनम-जनम यही पति मिले, इसलिए दूसरे व्रतों की परवाह न करने वाली पढ़ी-लिखी स्त्रियाँ भी इस व्रत की उपेक्षा नहीं कर सकतीं।
अवसर की बात, उस दिन कन्हैया लंच की छुट्टी में साथियों के साथ कुछ ऐसे काबू में आ गया कि सवा तीन रुपए खर्च हो गए। वह लाजो का बताया सरगी का सामान घर नहीं ला सका। कन्हैया खाली हाथ घर लौटा तो लाजो का मन बुझ गया। उसने गम खाना सीखकर रूठना छोड़ दिया था, परन्तु उस साँझ मुँह लटक ही गया। आँसू पोंछ लिए और बिना बोले चौके-बर्तन के काम में लग गयी। रात के भोजन के समय कन्हैया ने देखा कि लाजो मुँह सुजाए है, बोल नहीं रही है, तो अपनी भूल कबूल कर उसे मनाने या कोई और प्रबंध करने का आश्वासन देने के बजाय उसने उसे डाँट दिया।
लाजो का मन और भी बिंध गया। कुछ ऐसा खयाल आने लगा-इन्ही के लिए तो व्रत कर रही हूँ और यही ऐसी रुखाई दिखा रहे हैं। ... मैं व्रत कर रही हूँ कि अगले जनम में भी 'इन' से ही ब्याह हो और मैं सुहा ही नहीं रही हूँ...। अपनी उपेक्षा और निरादर से भी रोना आ गया। कुछ खाते न बना। ऐसे ही सो गयी।
तड़के पड़ोस में रोज की अपेक्षा जल्दी ही बर्तन भांडे खटकने की आवाज आने लगी। लाजो को याद आने लगा-शान्ति बता रही थी कि उसके बाबू सरगी के लिए फेनियाँ लाए हैं, तार वाले बाबू की घरवाली ने बताया था कि खोए की मिठाई लाए हैं। लाजो ने सोचा, उन मर्दों को खयाल है न कि हमारी बहू हमारे लिए व्रत कर रही है; इन्हें जरा भी खयाल नहीं।
लाजो का मन इतना खिन्न हो गया कि सरगी में उसने कुछ भी न खाया। न खाने पर भी पति के नाम का व्रत कैसे न रखती। सुबह-सुबह पड़ोस की स्त्रियों के साथ उसने भी करवे का व्रत करने वाली रानी और करवे का व्रत करने वाली राजा की प्रेयसी दासी की कथा सुनने और व्रत के दूसरे उपचार निबाहे। खाना बनाकर कन्हैयालाल को दफ्तर जाने के समय खिला दिया। कन्हैया ने दफ्तर जाते समय देखा कि लाजो मुँह सुजाए है। उसने फिर डांटा- ' मालूम होता है कि दो-चार खाए बिना तुम सीधी नहीं होगी।'
लाजो को और भी रुलाई आ गयी। कन्हैया दफ्तर चला गया तो वह अकेली बैठी कुछ देर रोती रही। क्या जुल्म है। इन्हीं के लिए व्रत कर रही हूँ और इन्हें गुस्सा ही आ रहा है। ...जनम-जनम ये ही मिलें इसीलिये मैं भूखी मर रही हूँ। ...बड़ा सुख मिल रहा है न!...अगले जनम में और बड़ा सुख देंगे!...ये ही जनम निबाहना मुश्किल हे रहा है। ...इस जनम में तो इस मुसीबत से मर जाना अच्छा लगता है, दूसरे जनम के लिए वही मुसीबत पक्की कर रही हूँ...।
लाजो पिछली रात भूखी थी, बल्कि पिछली दोपहर के पहले का ही खाया हुआ था। भूख के मारे कुड़मुड़ा रही थी और उस पर पति का निर्दयी व्यवहार। जनम-जनम, कितने जनम तक उसे ऐसा ही व्यवहार सहना पड़ेगा! सोचकर लाजो का मन डूबने लगा। सिर में दर्द होने लगा तो वह धोती के आँचल सिर बाँधकर खाट पर लेटने लगी तो झिझक गई-करवे के दिन बान पर नहीं लेटा या बैठा जाता। वह दीवार के साथ फ़र्श पर ही लेट रही।
लाजो को पड़ोसिनों की पुकार सुनाई दी। वे उसे बुलाने आई थीं। करवा-चौथ का व्रत होने के कारण सभी स्त्रियाँ उपवास करके भी प्रसन्न थीं। आज करवे के कारण नित्य की तरह दोपहर के समय सीने-पिरोने, काढ़ने-बुनने का काम किया नहीं जा सकता था; करवे के दिन सुई, सलाई, और चरख़ा छुआ नहीं जाता। काज से छुट्टी थी और विनोद के लिए ताश या जुए की बैठक जमाने का उपक्रम हो रहा था। वे लाजो को भी उसी के लिए बुलाने आयी थीं। सिर-दर्द और मन के दुःख के करण लाजो जा नहीं सकी। सिर-दर्द और बदन टूटने की बात कहकर वह टाल गयी और फिर सोचने लगी-ये सब तो सुबह सरगी खाए हुए हैं। जान तो मेरी ही निकल रही है।...फिर अपने दुःखी जीवन के कारण मर जाने का खयाल आया और कल्पना करने लगी कि करवा-चौथ के दिन उपवास किए-किए मर जाए, तो इस पुण्य से जरूर ही यही पति अगले जन्म में मिले...।
लाजो की कल्पना बावली हो उठी। वह सोचने लगी-मैं मर जाऊँ तो इनका क्या है, और ब्याह कर लेंगे। जो आएगी वह भी करवा चौथ का व्रत करेगी। अगले जनम में दोनों का इन्हीं से ब्याह होगा, हम सौतें बनेंगी। सौत का खयाल उसे और भी बुरा लगा। फिर अपने-आप समाधान हो गया-नहीं, पहले मुझसे ब्याह होगा, मैं मर जाऊँगी तो दूसरी से होगा। अपने उपवास के इतने भयंकर परिणाम की चिंता से मन अधीर हो उठा। भूख अलग व्याकुल किए थी। उसने सोचा-क्यों मैं अपना अगला जनम भी बरबाद करूँ? भूख के कारण शरीर निढाल होने पर भी खाने को मन नहीं हो रहा था, परन्तु उपवास के परिणाम की कल्पना से मन मन क्रोध से जल उठा; वह उठ खड़ी हुई।
कन्हैयालाल के लिए उसने सुबह जो खाना बनाया था उसमें से बची दो रोटियाँ कटोरदान में पड़ी थीं। लाजो उठी और उपवास के फल से बचने के लिए उसने मन को वश में कर एक रोटी रूखी ही खा ली और एक गिलास पानी पीकर फिर लेट गई। मन बहुत खिन्न था। कभी सोचती-ठीक ही तो किया, अपना अगला जनम क्यों बरबाद करूँ? ऐसे पड़े-पड़े झपकी आ गई।
कमरे के किवाड़ पर धम-धम सुनकर लाजो ने देखा, रोशनदान से प्रकाश की जगह अंधकार भीतर आ रहा था। समझ गई, दफ्तर से लौटे हैं। उसने किवाड़ खोले और चुपचाप एक ओर हट गई।कन्हैयालाल ने क्रोध से उसकी तरफ देखा-' अभी तक पारा नहीं उतरा! मालूम होता है झाड़े बिना नहीं उतरेगा !'
लाजो के दुखते हुए दिल पर और चोट पड़ी और पीड़ा क्रोध में बदल गई। कुछ उत्तर न दे वह घूमकर फिर दीवार के सहारे फ़र्श पर बैठ गई।
कन्हैयालाल का गुस्सा भी उबल पड़ा- ' यह अकड़ है! ...आज तुझे ठीक कर ही दूँ।' उसने कहा और लाजो को बाँह से पकड़, खींचकर गिराते हुए दो थप्पड़ पूरे हाथ के जोर से ताबड़तोड़ जड़ दिए और हाँफते हुए लात उठाकर कहा, ' और मिजाज दिखा?... खड़ी हो सीधी।'
लाजो का क्रोध भी सीमा पार कर चुका था। खींची जाने पर भी फ़र्श से उठी नहीं। और मार खाने के लिए तैयार हो उसने चिल्लाकर कहा,' मार ले, मार ले! जान से मार डाल! पीछा छूटे! आज ही तो मारेगा! मैंने कौन व्रत रखा है तेरे लिए जो जनम-जनम मार खाऊँगी। मार, मार डाल...!'
कन्हैयालाल का लात मारने के लिए उठा पाँव अधर में ही रुक गया। लाजो का हाथ उसके हाथ से छूट गया। वह स्तब्ध रह गया। मुँह में आई गाली भी मुँह में ही रह गई। ऐसे जान पड़ा कि अँधेरे में कुत्ते के धोखे जिस जानवर को मार बैठा था उसकी गुर्राहट से जाना कि वह शेर था; या लाजो को डाँट और मार सकने का अधिकार एक भ्रम ही था। कुछ क्षण वह हाँफता हुआ खड़ा सोचता रहा और फिर खाट पर बैठकर चिन्ता में डूब गया। लाजो फ़र्श पर पड़ी रो रही थी। उस ओर देखने का साहस कन्हैयालाल को न हो रहा था। वह उठा और बाहर चला गया।
लाजो फ़र्श पर पड़ी फूट-फूटकर रोती रही। जब घंटे-भर रो चुकी तो उठी। चूल्हा जलाकर कम-से-कम कन्हैया के लिए खाना तो बनाना ही था। बड़े बेमन उसने खाना बनाया। बना चुकी तब भी कन्हैयालाल लौटा नहीं था। लाजो ने खाना ढँक दिया और कमरे के किवाड़ उढ़काकर फिर फ़र्श पर लेट गई। यही सोच रही थी, क्या मुसीबत है जिन्दगी। यही झेलना था तो पैदा ही क्यों हुई थी?...मैंने क्या किया था जो मारने लगे।
किवाड़ों के खुलने का शब्द सुनाई दिया। वह उठने के लिए आँसुओं से भीगे चेहरे को आँचल से पोछने लगी। कन्हैयालाल ने आते ही एक नजर उसकी ओर डाली। उसे पुकारे बिना ही वह दीवार के साथ बिछी चटाई पर चुपचाप बैट गया। कन्हैयालाल का ऐसे चुप बैठ जाना नई बात थी, पर लाजो गुस्से में कुछ न बोल रसोई में चली गई। आसन डाल थाली-कटोरी रख खाना परोस दिया और लोटे में पानी लेकर हाथ धुलाने के लिए खड़ी थी। जब पाँच मिनट हो गए और कन्हैयालाल नहीं आया तो उसे पुकारना ही पड़ा, ' खाना परस दिया है।'
कन्हैयालाल आया तो हाथ नल से धोकर झाड़ते हुए भीतर आया। अबतक हाथ धुलाने के लिए लाजो ही उठकर पानी देती थी। कन्हैयालाल दो ही रोटी खाकर उठ गया। लाजो और देने लगी तो उसने कह दिया ' और नहीं चाहिए।' कन्हैयालाल खाकर उठा तो रोज की तरह हाथ धुलाने के लिए न कहकर नल की ओर चला गया। लाजो मन मारकर स्वयं खाने बैठी तो देखा कि कद्दू की तरकारी बिलकुल कड़वी हो रही थी। मन की अवस्था ठीक न होने से हल्दी-नमक दो बार पड़ गया था। बड़ी लज्जा अनुभव हुई, ' हाय, इन्होंने कुछ कहा भी नहीं। यह तो जरा कम-ज्यादा हो जाने पर डाँट देते थे।'
लाजो से दुःख में खाया नहीं गया। यों ही कुल्ला कर, हाथ धोकर इधर आई कि बिस्तर ठीक कर दे, चौका फिर समेट देगी। देखा तो कन्हैयालाल स्वयं ही बिस्तर झाड़कर बिछा रहा था। लाजो जिस दिन से इस घर में आई थी ऐसा कभी नहीं हुआ था। लाजो ने शरमाकर कहा, ' मैं आ गई, रहने दो। किए देती हूँ।' और पति के हाथ से दरी चादर पकड़ ली। लाजो बिस्तर ठीक करने लगी तो कन्हैयालाल दूसरी ओर से मदद करता रहा। फिर लाजो को संबोधित किया, ' तुमने कुछ खाया नहीं। कद्दू में नमक ज्यादा हो गया है। सुबह और पिछली रात भी तुमने कुछ नहीं खाया था। ठहरो, मैं तुम्हारे लिए दूध ले आता हूँ।'
लाजो के प्रति इतनी चिन्ता कन्हैयालाल ने कभी नहीं दिखाई थी। जरूरत भी नहीं समझी थी। लाजो को उसने 'चीज' समझा था। आज वह ऐसे बात कर रहा था जैसे लाजो भी इनसान हो; उसका भी खयाल किया जाना चाहिए। लाजो को शर्म तो आ ही रही थी पर अच्छा भी लग रहा था। उसी रात से कन्हैयालाल के व्यवहार में एक नरमी-सी आ गई। कड़े बोल की तो बात क्या, बल्कि एक झिझक-सी हर बात में; जैसे लाजो के किसी बात के बुरा मान जाने की या नाराज हो जाने की आशंका हो। कोई काम अधूरा देखता तो स्वयं करने लगता। लाजो को मलेरिया बुखार आ गया तो उसने उसे चौके के समीप नहीं जाने दिया। बर्तन भी खुद साफ कर लिए। कई दिन तो लाजो को बड़ी उलझन और शर्म महसूस हुई, पर फिर पति पर और अधिक प्यार आने लगा। जहाँ तक बन पड़ता घर का काम उसे नहीं करने देती, 'यह काम करते मर्द अच्छे नहीं लगते...।'
उन लोगों का जीवन कुछ दूसरी ही तरह का हो गया। लाजो खाने के लिए पुकारती तो कन्हैया जिद करता, ' तुम सब बना लो, फिर एक साथ बैठकर खाएँगे।' कन्हैया पहले कोई पत्रिका या पुस्तक लाता था तो अकेला मन-ही-मन पढ़ा करता था। अब लाजो को सुनाकर पढ़ता या खुद सुन लेता। यह भी पूछ लेता, ' तुम्हें नींद तो नहीं आ रही ? '  साल बीतते मालूम न हुआ। फिर करवा चौथ का व्रत आ गया। जाने क्यों लाजो के भाई का मनीऑर्डर करवे के लिए न पहुँचा था। करवा चौथ के पहले दिन कन्हैयालाल दफ्तर जा रहा था। लाजो ने खिन्नता और लज्जा से कहा, ' भैया करवा भेजना शायद भूल गए।'
कन्हैयालाल ने सांत्वना के स्वर में कहा,' तो क्या हुआ? उन्होंने जरूर भेजा होगा। डाकख़ाने वालों का हाल आजकल बुरा है। शायद आज आ जाए या और दो दिन बाद आए। डाकख़ाने वाले आजकल मनीआर्डर के पन्द्रह-पन्द्रह दिन लगा देते हैं। तुम व्रत-उपवास के झगड़े में मत पड़ना। तबीयत खराब हो जाती है। यों कुछ मंगाना ही है तो बता दो, लेते आएँगे, पर व्रत-उपवास से होता क्या है ? ' सब ढकोसले हैं।'
'वाह, यह कैसे हो सकता है! हम तो जरूर रखेंगे व्रत। भैया ने करवा नहीं भेजा न सही। बात तो व्रत की है, करवे की थोड़े ही।' लाजो ने बेपरवाही से कहा। संध्या-समय कन्हैयालाल आया तो रूमाल में बँधी छोटी गाँठ लाजो को थमाकर बोला, ' लो, फेनी तो मैं ले आया हूँ, पर व्रत-व्रत के झगड़े में नहीं पड़ना।' लाजो ने मुसकुराकर रूमाल लेकर अलमारी में रख दिया। अगले दिन लाजो ने समय पर खाना तैयार कर कन्हैया को रसोई से पुकारा, ' आओ, खाना परस दिया है।' कन्हैया ने जाकर देखा, खाना एक ही आदमी के लिए परोसा था- ' और तुम?' उसने लाजो की ओर देखा।
' वाह, मेरा तो व्रत है! सुबह सरगी भी खा ली। तुम अभी सो ही रहे थे।' लाजो ने मुस्काकर प्यार से बताया। ' यह बात...! तो हमारा भी व्रत रहा।' आसन से उठते हुए कन्हैयालाल ने कहा। लाजो ने पति का हाथ पकड़कर रोकते हुए समझाया, ' क्या पागल हो, कहीं मर्द भी करवा चौथ का व्रत रखते हैं!...तुमने सरगी कहाँ खाई?' 

'नहीं, नहीं, यह कैसे हो सकता है ।' कन्हैया नहीं माना,' तुम्हें अगले जनम में मेरी जरूरत है तो क्या मुझे तुम्हारी नहीं है? या तुम भी व्रत न रखो आज!' लाजो पति की ओर कातर आँखों से देखती हार मान गई। पति के उपासे दफ्तर जाने पर उसका हृदय गर्व से फूला नहीं समा रहा था।

स्व. यशपाल

Saturday, 28 September 2013

थोड़ा- बहुत तो ईमानदार होना ही होगा। (पुरस्कार-विवाद) - नवनीत पाण्डे



थोड़ा- बहुत तो ईमानदार होना ही होगा। (पुरस्कार-विवाद) - नवनीत पाण्डे

(सर्वप्रथम कृतज्ञता सूचना का अधिकार (आरटीआई) प्रस्ताव लानेवालों और उसे कानून बनवानेवालों का जिसकी वजह से अकादमियों से प्राप्त सूचनाओं से पुरस्कारों बाबत वहां हो रही कारगुजारियों के बारे में कही, सुनी जा रही कहानियों के रोचक सच जान हतप्रभ हुआ, यह लम्बा आलेख उसी से उपजे आक्रोश का एक सांकेतिक दस्तावेज भर है जबकि असल और भी कटु और सह्र्दय सच्चे लेखक को हताश करने वाले है इस विषय अगर कोई लिखना चाहे तो इतना मसाला हैं कि पूरी किताब तैयार की सकती है। यह तो तब है जब मेरे पास केवल जब 2006 से 2012 तक के सिर्फ़ राजस्थानी भाषा से सम्बन्धित आंकड़े हैं। )

मित्रो! पुरस्कारों और विवादों का अब तो गहरा नाता-सा हो गया है। विवाद न हो, वो पुरस्कार ही क्या? पिछले सालों से साहितियक पुरस्कारों के होते जा रहे नित नए खुलासे को देख मुझे राजनेताओं, मंत्रियों, ब्यूरोक्रेटस और सरकारी कर्मचारियों द्वारा किए गए घोटालों के समाचार याद आते हैं और लगने लगा है कि अब तक इन सब चीजों से निरापद मानी-जानी जानेवाली शब्दकारों की दुनिया में भी ये विषाणु बुरी तरह फैलने और अपनी दुर्गंध फैलाने लगे हैं जो कि अच्छे संकेत नहीं है, वैसे तो इस बारे में अपने-अपने ब्लाग पर प्रखर आलोचक- कवि गणेश पाण्डेय, अशोक कुमार पाण्डेय, दयानंद पाण्डेय ने बहुत बार अपनी चिंताओं से व्यतिथ हो लिखा है और लिख रहे हैं। उन्हीं चिंताओं व व्यथाओं को अपनी जानकारी और सीमाओं के अनुसार मैंने भी अपने इस आलेख में समेटने का प्रयास किया है।
सबसे पहले विचारणीय प्रश्न जो इस मामले में मुझे जो लगता है, वह यह कि क्यों हर पुरस्कार के पीछे हमें कोई न कोई महाभारत दिखायी देने लगा है और यह तक कहा जाने लगा है कि पुरस्कार बंद ही कर दिए जाने चाहिए या निर्णायक ये होंगे तो निर्णय भी ऐसे ही होंगे। कमाल की बात ये कि पुरस्कारों पर उठने वाले विवादों के बाद उनके निर्णायक रहे विद्वजनों के अपने निर्णय के औचित्य बाबत विचार अपवाद स्वरूप ही देखने को मिलते हैं। रही बात पुरस्कारों को बंद करने की तो मेरे विचार से यह समस्या का हल नहीं है, पुरस्कार में क्या खराबी है, पुरस्कार तो आपके अच्छे, उत्तम, श्रेष्ठ कार्य का परिणाम है जो आपके भविष्य के कार्यों को परिष्कृत करता है, आपको प्रेरणा देता है जिससे आपको लगे कि आप जो भी कुछ कर रहे हैं, वह इस समय,  समाज के समाजिक, साहितियक और सांस्कृतिक क्षेत्र में उल्लेखनीय, सराहनीय और महत्त्वपूर्ण है जो केवल आपकी ही नहीं आपके समाज, देश की प्रतिष्ठा में भी अभिवृद्धि करता है।
घर में एक बच्चा भी जब ऐसा कोई असंभव, अनपेक्षित अच्छा कार्य करता है तो हम उसकी पीठ ठोंकते हैं, शाबासी देते हैं। उस पीठ ठुकने, और शाबासी मिलने के बाद कभी उसके चेहरे को देखें, उसके चेहरे पर एक दीप्ति, आलौकिक आत्मसंतुष्टि भरी मोहक गर्वोन्मुक्त मुस्कान दिखायी देगी। कुछ वैसे ही जैसे अकादमिक, प्रतियोगी परीक्षाओं में आनेवाली मैरिट और चयन एक होनहार, प्रतिभावाले विधार्थी के भविष्य के कई आयाम खोल देती है। इसीलिए पुरस्कार जरूरी है, बेहद जरूरी है। खराबी पुरस्कारों और सम्मानों में नहीं उन प्रकि्रयाओं में हैं जिनके तहत पुरस्कार-सम्मान दिए-लिए जाते हैं और जिनकी वजह से नौबत ये आ जाए कि किसी को कहना पड़े या ऐसी धारणा बनें कि पुरस्कार बंद ही कर दिए जाने चाहिए।
इधर जिस तरह से प्रतिभा की बजाय इतर राजनैतिक, खेमेबाजी, वादों- विवादों, तिकड़मों आदि कारणों से चाहे वह साहित्य, कला के क्षेत्र में हों कि अन्य खेल आदि क्षेत्र में पुरस्कार दिए- लिए जाने लगे हैं, न केवल पुरस्कारों की गरिमा घटी है, वास्तविक प्रतिभाओं का मोहभंग व उन में पुरस्कारों के प्रति नैराश्य भाव पैदा हुआ है। साथ ही पुरस्कार देने-लेने वालों की मनसा, वाचा व कर्मणा पर भी प्रश्नचिन्ह लगे हैं जिन्हें अनदेखा करके टालना इस समस्या को और बढावा देना ही होगा। मेरे विचार से हर जिम्मेदार बुद्धिजीवी को इस में पूरी सक्रियता से हस्तक्षेप करना चाहिए और इस में अपनी क्षमतानुसार जहां, जो कुछ सुझाव व उपाय सुझाए जा सके, सुझाने चाहिए। कहा भी गया है कि कर्इ बार गंदगी को साफ करने के लिए गंदगी में उतर खुद भी गंदा होना पड़ता है। यहां कहीं पढ कर नोट किया किसी का यह नोट 'प्रत्येक विवाद की परिणति अवांछित शोर या अर्थहीन कानाफूसियों में बदल जाना नहीं है। विवाद उतने नकारात्मक भी नहीं होते, जैसाकि इन्हें समझ लिया जाता है और न ही विवादों का मकसद हमेशा सिर्फ हंगामा खड़ा करना होता, बलिक उनके जरिए सूरत बदलने की राहें तलाशने की सकरात्मक कोशिशें भी की गई हैं। लेकिन वाद-विवाद-संवाद की पूरी प्रक्रिया को समझे बगैर ऐसा कर पाना संभव नहीं है।’ बहुत ही प्रासंगिक लगता है।

मैं यहां अपनी बात केंद्रीय साहित्य अकादमी द्वारा दिए जानेवाले पुरस्कार विवादों को केंद्र में रख करना चाहूंगा। इसके लिए सबसे पहले हालांकि लेखन से जुड़े अधिकतर विद्वजन इससे अनभिज्ञ नहीं होंगे फिर भी यहां सरसरी दृष्टि से अकादमी की पुरस्कार चयन- प्रकि्रया पर दृष्टिपात करना उचित लग रहा है।
 केंद्रीय साहित्य अकादमी के नियमों मुताबिक सबसे पहले (1) सर्व प्रथम मान्यता प्राप्त प्रदत्त भाषा की विचारणीय पुस्तकों की एक आधार सूची बनेंगी जिसका निर्माण उस भाषा के एक विशेषज्ञ अथवा अकादमी अध्यक्ष के विवेक पर दो विशेषज्ञों द्वारा कराया जाता है।  (2) परामर्श मण्डल का हर सदस्य अधिक से अधिक पांच नामों का पैनल भेजेगा और अकादमी अध्यक्ष प्राप्त पैनलों में से विशेषज्ञ या विशेषज्ञों का चयन करेंगे। (परामर्श मण्डल के हर सदस्य एक- दूसरे के टच में रहते हैं अत: सांठ- गांठ और अपने हितों से बाहर कुछ करेंगे, संभावना कम ही हैं) (3) विशेषज्ञों द्वारा तैयार आधार सूची संबद्ध भाषा परामर्श मण्डल(संयोजक सहित) को दो पुस्तकों के अनुमोदन हेतु भेजी जाती हैं जिस में वह सूची से बाहर अपनी पसंद की दो पुस्तकों के नाम भी दे सकते हैं।
इसके बाद प्रारंभिक पैनल में दस निर्णायक जिनका चयन परामर्श मण्डल के सुझावों पर विचार कर होता है और परामर्श मण्डल के सदस्यों से प्राप्त संस्तुतियों को संकलित कर उन्हीं के द्वारा सुझाए निर्णायकों को भेजा जाता है। ( है न मजे की बात) निर्णायक प्राप्त संस्तुतियों में से दो पुस्तकें अनुमोदित करेगा। इस में भी वह अपने विवेक से सूची से बाहर की भी पुस्तकें भेज सकता है। (तय है कि ऐसा अनुमोदन रिजेक्ट होना है)
प्रारंभिक पैनल के निर्णायकों की संस्तुतियों पर एक त्रि-सदस्यीय जूरी विचार करेगी और जूरी के सदस्यों का चयन भी संबद्ध भाषा के परामर्श मण्डल संयोजक व सदस्यों की संस्तुतियों पर विचार कर होगा और प्रारंभिक पैनल के निर्णायकों द्वारा संस्तुत पुस्तकें खरीद अकादमी जूरी के सदस्यों और संयोजक को भेजेगी। संयोजक, जूरी और अकादमी के बीच संपर्क सूत्र का काम करेगा और वही सुनिश्चित करेगा कि जूरी की बैठक उचित और संतोषजनक हो, वही जूरी रिपोर्ट पर अपने हस्ताक्षर करेगा। जूरी सर्वसम्मति या बहुमत से पुरस्कार हेतु एक पुस्तक की अथवा अपने विवेक से यह भी अनुशंसा कर सकती है कि इस वर्ष एक भी कृति योग्य नहीं है।

ज्ञानपीठ या केंद्रीय साहित्य अकादमी अथवा अन्य, आज की तारीख कोई भी  पुरस्कार निष्कलंक नहीं रहा। केंद्रीय साहित्य अकादमी के पुरस्कारों पर समय-समय पर उठे विवादों के कारण जानने की गरज से मैंने अकादमी के पुरस्कार नियम- चयन प्रक्रिया के आधार पर विवादों के कारणों को जानने-समझने का प्रयास किया। इस संदर्भ में अकादमी के विभिन्न भाषा परामर्श मण्डल के कुछ सदस्यों से व्यकितश: बात भी की, उन से मिली जानकारी के आधार पर कहूं तो साफ लगता है सारे नियम- प्रक्रिया और उनकी तथाकथित पारदर्शिता-ईमानदारी सिर्फ देखने- दिखाने, छलावे और लीपापोती वाले हैं, यहां भी हाल हमारे लोकसभा के सांसदों के स्वहित से जुड़े मामलों में ध्वनि-मत से एक राय हो मुंडी हिला प्रस्ताव पास करने जैसा ही है। हर कदम संयोजक और परामर्श सदस्यों की संस्तुति- अनुशंसा अनिवार्य है। ये राजी तो रब राजी। चूंकि हर निर्णय की पुष्टि सामान्य सभा से करानी होती है इसलिए हर भाषा परामर्श मण्डल की दूसरी भाषा मण्डल संयोजकों-सदस्यों से फुल टयूनिंग और सैटिंग की हुयी होती है...मतलब कि आप हमारे लिए-किए निर्णयों पर सहमति दे मुहर लगाएं। हम आपके लिए- किए पर...बिल्कुल अंधे बांटे सीरणी वाली कहावत अक्षरक्ष: प्रत्यक्ष सिद्ध होती दिखायी देती है। इस में कई बार दूसरी भाषा के लेखकों को भी विशेषज्ञ, निर्णायक बना उपकृत करने के मामले सामने आए हैं यथा राजस्थानी भाषा के पुरस्कार का निर्णायकों में उर्दू, हिन्दी भाषा के लेखकों के शामिल होने के उदाहरण तो जगजाहिर है। इस तरह ये आपसदारियां लगातार निभायी जाती रहती है। सरकारी विभागों में जैसे स्थानांतरित हो हर जानेवाला भ्रष्ट अफसर- आनेवाले अफसर-कर्मचारी को चार्ज देते समय सारे गुर सिखा जाता है कुछ वैसे ही खेल यहां भी धड़ल्ले से चलते हैं। जरूरत होती है वोटींग- बहुमत आदि की कागजी तकनीकी औपचारिकताएं पूरी करने की, जो हो ही जाती हैं और यह सिर्फ पुरस्कार तक ही सीमित नहीं है, अकादमी की अन्य सभी अकादमिक योजनाओं में भी ऐसा ही तमाशा होता है।
संयोजक-परामर्श मंडल व उनके सदस्यों की अनुशंसा जिसे मिलीभगत या संयोजक के दिशा-निर्देश कहा जाना ज्यादा उचित होगा...द्वारा अपने-अपने क्षेत्र से अपनी-अपनी पसंद के निर्णायकों की सूची मांगी जाती है और वह सूची चार वर्ष के परामर्श मण्डल के पूरे कार्यकाल में एक पैनल का काम करती है, पुरस्कार प्रस्ताव हेतु बनी आधार सूची(ग्राउंड लिस्ट) में अंतिम दौर में पहुंची (मजे की बात यह आधार सूची (ग्राउंड लिस्ट) भी संयोजक परामर्श मण्डल, सदस्यों व अकादमी में मान्यता प्राप्त संस्थाओं की अनुशंसा पर बनायी जाती है और उन्हीं के अनुसार मनमर्जी किताबों की सूची में से किताबें अंदर-बाहर कर दी जाती है) किताबें उस निर्णायक पैनल के निर्णायकों को अकादमी द्वारा भेजा जाता है। चालाकी देखिए पुस्तकों का चयन और संस्तुति संयोजक, परामर्श मण्डल के सदस्यों और अकादमी में मान्यता प्राप्त संस्थाओं द्वारा तैयार सूची में से पुरस्कार हेतु पुस्तकों की आधार सूची (ग्राउंड लिस्ट) तैयार की जाती है। यानि अगर आपकी किताब संयोजक, परामर्श मण्डल, और संस्था की जानकारी में नहीं है तो आप की किताब उस आधार सूची (ग्राउंड लिस्ट) में ही नहीं होगी, अगर आधार सूची (ग्राउंड लिस्ट) में ही नहीं है तो पुरस्कृत होने योग्य के बावजूद, वह लिस्ट में नहीं होगी, लिस्ट में नही तो पुरस्कार में कहां से होगी। इस में भी कई बार जब भूले से गलत आकलन की वजह से कोर्इ विरोधी पक्ष या अपवादी लेखक निर्णायक या मण्डल में आ जाता है तो उसके विरोध की वजह से आधार सूची (ग्राउंड लिस्ट) से बाहर की  किताब भी  शामिल हो जाती है और बावजूद असहमति पुरस्कार भी पा जाती है लेकिन ऐसे चमत्कारी अवसर बहुत ही कम आते हैं, बहुदा तो वही होता है जो परामर्श मण्डल का संयोजक चाहता है।
इसलिए केंद्रीय साहित्य साहित्य अकादमी के पुरस्कार के लिए उस भाषा के परामर्श मण्डल का संयोजक एक अहम कड़ी होता है, अपने सोचे निर्णय को क्रियान्वित कराने के लिए उसकी अन्य भाषा के संयोजकों से सैटिंग और मीटिंग चलती रहती है। यही कारण है कि अकादमी के विभिन्न परामर्श मण्डलों में आपको घूम-फिर वही चेहरे- नाम दिखायी देते हैं, संयोजक के पास एक और अभेद्य हथियार है कि परामर्श मण्डल के कार्यकाल की समापित पूर्व अंतिम बैठक में वही आनेवाले परामर्श मण्डल के संयोजक (प्रदेशों से आए नामों में से) अपने मनचाहे नाम का प्रस्ताव कर उसे संयोजक बना जाता है अर्थात उत्तराधिकार जैसा ही कुछ। अत: यह स्वाभाविक ही है आनेवाला संयोजक भी भावनात्मक रूप से  उसका कर्जदार होगा और उसकी सलाहें भी लेगा और इतिहास बताता है और देखा भी गया है कि उन सलाहों पर अमल भी किया जाता है। चूंकि एक व्यकित दो बार ही संयोजक बन सकता है तो यह पद एक अप्रत्यक्ष सौदे के तहत भी आपसदारी से लिया- दिया जाता रहा है। 
इन सब तामझामों और प्रक्रियाओं के बीच इतने लंबे समय तक अकादमी में रहने की वजह से संयोजकों और परामर्श मण्डल के सदस्यों की अकादमी के कार्यालय स्टाफ से सम्पर्क साधने और कई प्रक्रियाओं में अपनी दखल दे देना कौन मुश्किल बात है। कार्यालयों की कार्यविधियों- कार्यकलापों से कोई अनजान नहीं। यही वजह है कि कई बार औपचारिक निर्णय तो बाद में आते हैं लेकिन अनौपचारिक रूप से वे निर्णय पहले ही मालूम हो जाया करते हैं।
कई उस्ताद तो अपने वांछित लेखकों की किताबें अपने वांछित निर्णायकों तक पहुंचाने की भी घुसपैठ रखते हैं। इसके अलावा जब पैनल के निर्णायक के पास अनुशंसा के लिए कोई किताब आती है तो वह उत्साह में  अपने परामर्श मण्डल के संयोजक या सदस्य से संपर्क कर सूचना दे देता है और उसे आगे के दिशा-निर्देश दे दिए जाते हैं उन्हें किसकी अनुशंसा और कैसे करनी है चूंकि अपने को निर्णायक बनाए जाने से वह मुदित होता है वह वही करता है जो कहा जाता है। आखिर अहसानमंद जो होता है। कई बार तो ऐसे भी मौके आए बताए जाते हैं कि अकादमी द्वारा बुलायी बैठक में ही आमने- सामने बैठक कर हाथों- हाथ तय कर लिया जाता है जैसा कि पिछले दिनों समाचारों में युवा पुरस्कार की बैठक का आंखों देखा हाल सुनने में आया ही था। सो, अकादमी की गोपनीयता, निर्णय पारदर्शिता वाला ध्येय, सोच को धत्ता बताते हुए वह सब कर लिया, दिया जाता है जिसके करने का मंतव्य होता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण केंद्रीय साहित्य अकादमी द्वारा दिए जानेवाले राजस्थानी के युवा पुरस्कार के चयन में साफ दिखायी दिया था, अब तक घोषित तीन युवा पुरस्कारों में से दो इक्कतीस जिलों वाले राजस्थान के एक ही शहर के दो युवाओं को दिया जाना कम से कम मुझे तो घोर आश्चर्य के साथ अकादमी की चयन प्रक्रिया में साफ-साफ सेंधमारी और अकादमी की चयन-प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगती है।
एक बंदर-बांट चलती रही है और चल रही है जिसे एक जिम्मेदार शब्दकर्मी द्वारा अनदेखा कर पल्ला झाड़ लेना अनुचित तो है ही, अपराध भी क्योंकि जिस तरह राजस्थानी अकादमी किसी की बपौती नहीं, केंद्रीय अकादमी भी किसी की बपौती नहीं है( जो कि हकीकत में समझ लिया गया है) जहां जो जी चाहे जैसे करें।  वह भी हम सब भारतीयों की है क्योंकि उसकी स्थापना का मूल भाव और उददेश्य ही नितांत गैर राजनैतिक और राजनैतिक दखल से मुक्त रखने की नीयत था, यही कारण है कि आज तक अकादमी के किसी भी कार्य-आयोजन में खुले रूप से राजनैतिक, सरकारी दखलंदाजी नहीं है जब कि कर्इ बार ऐसे प्रस्ताव लाने की कोशिशें की गई हैं और अभी भी जारी हैं। 
इसी प्रकार राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी द्वारा घोषित पुरस्कारों पर भी पिछले दिनों स्थानीय पत्रकारिता दबाव व अश्लीलता का आरोप लगा कुछ मित्रों द्वारा आरटीआई लगा अंगुली उठायी गयी और मनीषा कुलश्रेष्ठ की तरह एक महिला रचनाकार को अपमानित किया गया। खबर है वह महिला लेखिका एक निर्णायक और अन्य पर अखबार में अपनी कृति के बारे में प्रकाशित भददी टिप्पणी को आधार बना मानहानि का दावा ठोंक रही है।  सवाल यह है कि यह सब क्या है? क्यों है? हमारे लिए क्या महत्वपूर्ण है हमारा लिखना या हमारी महत्त्वाकांक्षाएं? अपना लिखा पढनेवाले पाठक महत्त्वपूर्ण है या लिखे पर पुरस्कार का प्रमाण-पत्र? हम हमारे लेखन से श्रेष्ठ बनना चाहते हैं कि हमारे द्वारा हासिल पुरस्कारों की संख्याओं से? बहुत ही गंभीर और विचारणीय प्रश्न है मित्रो! और इसी प्रश्न का सही उत्तर हमारी सोच को दिशा देता है, मेरा ऐसा मानना है। यहां अपने लेखन प्रतिभा के बूते देश के नामचीन हस्ताक्षर बनें उन अग्रज उदाहरणीय लेखकों और लेखकों की पैरवी करनेवाले से भी एक सवाल पूछने का मन हो रहा है कि वे कौन से कारण और दबाव हैं जो किसी भी पुरस्कार से ऊपर हस्ती गोपाल दास 'नीरज को भारत- भारती सम्मान के लिए अड़ जाने और पदमश्री, राजस्थान रत्न विजयदान देथा को प्रदेश की अकादमी के एक तुच्छ से पुरस्कार हेतु लाबिंग कराने पर मजबूर करती है।  

 पुरस्कारों, सम्मानों का सच मुझे तो उसी दिन पता चल गया था जब मैं पंद्रह-सोलह वर्ष का था, हिन्दी दिवस पर स्कूल में आयोजित बाल सभा में स्व:रचित हिन्दी कविता-पाठ प्रतियोगिता में मेरी स्व:रचित कविता की जगह हैड मास्टर साहब के बेटे की सुनायी सुभद्रा कुमारी चौहान लिखित 'झांसी की रानी को प्रथम घोषित कर दिया था क्योंकि प्रस्तुति अच्छी थी, उसने गा कर सुनाया था।
साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित होने के बाद हिन्दी के प्रसिèद कवि चंद्रकांत देवताले ने कहा कि साहित्य में राजनीति की तरह फ़ैसले बहुमत से नहीं लिए जाते हैं और यही कारण है कि कर्इ बार गलत लोगों को भी पुरस्कार मिल जाते हैं। उन्होंने कहा कि आज से करीब दो दशक पहले जब प्रख्यात कथाकार भीष्म साहनी अकादेमी के हिन्दी परामर्श समिति के संयोजक थे तब धर्मयुग के संपादक और अंधायुग जैसी कालजयी —ति के लेखक डा. धर्मवीर भारती को अकादेमी पुरस्कार इसलिए नहीं दिया जा सका क्योंकि बहुमत उनके पक्ष में नहीं था जबकि जूरी के सदस्य के रूप में मैंने उनका ही नाम प्रस्तावित किया था। इस बात का दुख मुझे आज तक है। (वाणी प्रकाशन समाचार- मार्च 2013)
अब एक दृष्टि सामान्यत: पुरस्कार देने की प्रकि्रया पर कुछ आकलन अर्थात जो भी पुरस्कार दिए जाने हैं उनके लिए नामित की अहर्ताएं और चयन के मानदण्ड। इसके बाद जो सबसे महत्त्वपूर्ण और विशेष काम है अहर्ता और मानदण्डों को परखने वाले योग्यतम विशेषज्ञ निर्णायकों का चयन। किसी भी पुरस्कार की गरिमा में निर्णायको की ही प्रमुख भूमिका होती है। निर्णायक एकानेक हो सकते है। निष्पक्षता की दृष्टि से अधिकतर यह संख्या तीन रखी जाती है ...तीन सुनते ही सबसे पहले मेरे जेहन में ताश का तीन पत्ती खेल आता है क्योंकि तीन की वजह से आज जो छिछालेदरी बीन बजते सुनायी दे रहे हैं, यह संख्या संदेहों के घेरे में आ गयी है। मतलब तीन की विश्वसनीयता खतरे में है? चाहे वे अकादमिक पुरस्कार हों या कार्पोरेटेड घरानों, संस्थाओं द्वारा बांटे जानेवाले पुरस्कार! अधिकतर में बंदरबांट, हित साधनेवाले प्रकरण या बाजार में नाम भुनाने की निम्न स्तर की कोशिशें साफ दिखायी देती हैं। और यही वजह है कि पुरस्कारों के साथ- साथ उसे देनेवालों- प्राप्तकर्ताओं की सिथति बहुत दयनीय और हास्यास्पद हो गयी है और इसका खामियाजा दोनों को भुगतना पड़ रहा है। दोनों ही अपमानित होते हैं।
गलत निर्णयों पर आम राय और भावना को अनदेखा कर और भविष्य के लिए उससे कोई सीख लेने की बजाय पुन: पुन: ऐसे ही निर्णय लिया जाना बहुत ही खेदजनक होने के साथ-साथ अकादमियों संस्थानों के कामकाज के तौर-तरीको और विश्वसनीयता को कठघरे में खड़ा तो करता ही है, साथ ही ये सवाल भी उठाता है कि आखिर ऐसा किन दबावों और कारणों से होता या किया जाता है?
 तिस पर यह कहा जाना कि ये निर्णय तीन निर्णायकों द्वारा लिया बहुमत निर्णय है, कह कर उस पर निष्पक्ष होने की मुहर लगा निर्णय को जायज ठहराना तो और भी दुखद है जो कि अब एक परिपाटी सी बनती जा रही है। यहां मुझे हाल ही में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने की दशा में अकादमी के पूर्व अध्यक्ष यू आर अनंतमूर्ति के बयान को तोड़-मरोड़ प्रस्तुत करने पर उसकी प्रतिक्रिया में दिए उनके बयान का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण अंश स्मरण हो आया है जिस में वे कहते हैं,'बहुमत भी हमेशा सही हो यह जरूरी नहीं।
सूचना अधिकार के अंतर्गत केंद्रीय साहित्य अकादमी से सन 2006 से 2012 तक के निर्णयों बाबत मांगे गए दस्तावेजों के अध्ययन से जो कुछ समझ आया उसका सार ये कि सन 2006 से 2012 तक के सभी एकल चयन परिणाम पत्रकों में अधिकतर में सिर्फ पुरस्कार हेतु चयनित पुस्तक की ही संयोजक द्वारा संस्तुति, समीक्षा लिख (सरकारी भाषा में कहें तो नोटिंग) त्रि-सदस्यीय निर्णायकों के हस्ताक्षर करा नीचे संयोजक ने हस्ताक्षर कर दिए हैं। इस में भी किसी परिणाम पत्रक में एक, किसी में दो तो किसी में तीनों निर्णायकों के हस्ताक्षर हैं और अधिकतर चयन पत्रको के साथ तीनों में से सिर्फ एक या दो निर्णायक की लिखित संस्तुतियां है, वह भी अधिकतर उनकी की जो चयन बैठक में अनुपसिथत रहे हैं और अधिकतर संस्तुतियां भी चयनित पुस्तक के विपक्ष में..... इसके अर्थ क्या हैं, जरा सी समझ रखनेवाला भी आसानी से समझ सकता है। हिसाब से देखा जाए तो पुरस्कार दौड़ में अंतिम आधार सूची में शामिल सभी कृतियों के बारें में निर्णायक क्या सोचते हैं और उन्होंने किन आधारों पर अमूक पुस्तक को श्रेष्ठ और अमूक को उससे कम श्रेष्ठ पाया...के बारे में अपना अभिमत स्पष्ट लिखना चाहिए लेकिन यहां तों केवल मात्र उसी कृति की संस्तुतियां हैं जिसे पुरस्कृत करना है, उसके साथ प्रतियोगी रही कृति या कृतियों के बारे में किसी भी निर्णायक या संयोजक महोदय की कलम से एक शब्द तक नहीं लिखा गया। मतलब बैठक में जो बैठे हैं वे मौखिक रूप से ही सारे विमर्श कर संयोजक महोदय एक कृति की रिपोर्ट बना (उस रिपोर्ट में भी साथ की प्रतियोगी कृति के जिक्र बिना) निर्णायकों से घुग्गी ठुकवा अपनी घुग्गी ठोंक देते हैं। दौड़ में शामिल अन्य किसी भी कृति पर किसी की कलम से एक शब्द भी नहीं। ये किस तरह के निर्णय हैं जनाब। जितनी भी प्रतियोगिताएं होती हैं... पहले के साथ .दूसरा या तीसरा स्थान पानेवाले वाले के कुछ तो अंक या विचार निर्णायक लिखते- बताते ही हैं लेकिन यहां तो एक से ही कथा शुरु एक पर ही खतम...दूसरे के दूसरे रहने का कारणों का जिक्र तक नहीं। एक और घोर आश्चर्य कि राजस्थानी के लेखकों, पुरस्कारों का मूल्यांकन राजस्थानी के विद्वानों के स्थान पर इतर भाषा के निर्णायक कर रहे हैं। यह सच सिर्फ मुख्य पुरस्कार का ही नहीं, अन्य पुरस्कारों का भी है। पहले युवा पुरस्कार (2011) के चयन में एक निर्णायक रहे राजस्थानी साहित्य में नामवर सिंह माने- जानेवाले आलोचक डा. कुंदन माली ने पुरस्कृत कृति को प्राथमिक स्तर पर ही खारिज करते हुए उसके पुरस्कार में शामिल किए जाने पर ही सवाल उठा दिए थे कि अकादमी के परामर्श मण्डल का सदस्य कैसे इस में शामिल हो सकता है और उन्होंने इस के लिए डा. मदनगोपाल लढा और ओम नागर की कृतियों की खूबियां गिनाते हुऐ उन में से एक को पुरस्कृत करने की संस्तुति की थी ( पूरे दस्तावेजों में यही एक मात्र संस्तुति है जिस में किसी निर्णायक ने पुरस्कृत कृति के अलावा अन्य कृतियों की विस्तार से व्याख्या सहित संस्तुति की है) लेकिन परिणाम पत्रक पर संयोजक की टिप्पणी हैं...दूरभाष पर मि. माली से बात कर उन्हें राजी कर लिया है। ... सन 2006 के राजस्थानी भाषा मुख्य पुरस्कार परिणाम पत्रक पर केवल एक निर्णायक के हस्ताक्षर है, इस में भी संयोजक टिप्पणी करते हैं कि बाकी दो निर्णायकों ने अपने अभिमत भेज दिए थे लेकिन अकादमी द्वारा प्रेषित दस्तावेजों में वे अभिमत संलग्न नहीं है।  इसी तरह 2009 के पुरस्कार जिस में जनकवि हरीश भादानी की कृति भी दौड़ में थी, परिणाम पत्रक पर संयोजक के मेजर जांगिड़ समर्थित नोट पर  प्रो. के. के. शर्मा (राजस्थानी में जितना कुछ आज पढ पाया हूं, कभी ये नाम मेरे पढने में नहीं आया, हो सकता है मेरी ये मेरी पाठकीय सीमा हो) व कुंदन माली के सिर्फ हस्ताक्षर है। तीसरे निर्णायक जो शायद अनुपसिथत थे, ने परिणाम पत्रक पर भादानी जी की कृति की संस्तुति की है। ये सब क्या है और क्यूं? क्यूं हम किसी लेखक का वाजिब हक मार अपनी क्षुद्र मानसिकताओं से किसी अन्य को तमगे दे देते हैं सिर्फ इसलिए कि वे अन्य आपके लिए तरह- तरह के आयोजन -प्रायोजन, अपनी कृतियों का आपके पवित्र हाथों लोकार्पण करा अपने मंचों पर आसीन कर आपको मालाओं से लाद साफे बंधवाते हैं, आपका सम्मान कर तालियां बजवाते हैं। सच में, इतिहास बताता है कि कई पुरस्कार तो मिले ही उनको हैं जिन्होंने संयोजक, परामर्श मण्डल की खातरी की है, अर्थात जिसने बजार्इ हाजिरी, अधिकतर उनकी हुर्इ खातरी। अकादमी से प्राप्त अगर ये दस्तावेज पूर्ण है तो इन में लोचा ही लोचा और घोर अनियमितताएं हैं।
यहां राजस्थानी परामर्श मण्डल के सदस्य रहे एक सदस्य की उपलबिधयों की बानगी देखें... चार वर्ष के कार्यकाल में दो अनुवाद प्रोजेक्ट खुद के और दो अपनी पत्नि (राजस्थानी भाषा के नए अनुवादक अवतार) के नाम स्वीकृत, साथ एक पुरस्कार की उपलब्धि..इसके अलावा वर्तमान परामर्श मण्डल के कुछ निर्णयों में भी सेंधमारी।
ये सच तो सन 2006 से 2012 तक के आंकड़ों के हैं, इससे पूर्व क्या और कैसे- कैसे मैनेज किया और कराया गया होगा प्रबु द्ध पाठक आसानी से समझ सकते हैं। कुल मिलाकर भैंस पानी में ही बैठी दिखायी दे दिखायी दे रही है। 
 कथाकार उदय प्रकाश ने परसाई जी को कोट करते हुए ठीक ही कहा है, 'साहित्य में यह विकलांग श्रèदा का दौर है, घोर नैतिक-मूल्यों के अवमूल्यन का दौर। जहां सिफऱ् विकलांग राज- व्यवस्था में बैठे अपने आकाओं की मिलीभगत से वे लोग साहित्य के स्वयंभू मसीहा बन बैठे हैं जिनका न साहित्य से सरोकार है न साहित्यकारों से। सिफऱ् अपना और अपनों का सिट्टा सेंकने में लगे हैं और विवाद होने पर वक्तव्यों के लिए अपने चेलों की जमात को आगे कर देते हैं 
'आज —कृति छपने से पहले ही चर्चित हो जाती है, पढे जाने से पहले ही उसे सनद बख्श दी जाती है कि यह हिन्दी की पहली और आखिरी रचना है। उसी हिसाब से एक — कृति पर कई कई पुरस्कार दिए जाते हैं। मेरी चिंता केवल पुरस्कार तक सीमित नहीं है बलिक उस अन्याय और अपमान के प्रति है जो हर दिन, हर पल एक रचनाकार को सहना पड़ता है। नासिरा शर्मा (संचेतना)
      'क्या वजह है कि जगदीश गुप्त को भारत-भारती सम्मान इस उम्र में आकर मिला? गिरिजा कुमार माथुर को अकादमी पुरस्कार इतनी देर से मिला, व्यास सम्मान तो स्वयं प्राप्त ही नहीं कर पाए। विष्णु प्रभाकर, देवेन्द्र सत्यार्थी, शैलेश मटियानी, रामदरश मिश्र, महीप सिंह, देवेंन्द्र इस्सर आदि को तो अभी भी याद नहीं किया गया है जबकि जगूड़ी को मिल गया है।....प्रताप सहगल(संचेतना)
      'अरुण कमल को 1998 का साहित्य अकादमी सम्मान मिलने पर अशोक वाजपेयी ने जनसत्ता में अपने डिस्पेच असमंजस में लिखा था अव्वल तो पुरस्कार नेमिचंद जैन, विनोद कुमार शुक्ल, विष्णु खरे और चंद्रकांत देवताले की पुस्तकों के रहते इस पुस्तक को मिले यह रुचि या मानदण्ड की विभिन्नता का मामला नहीं हो सकता, तब जब जूरी में भीष्म साहनी, केदारनाथ सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी हों। यह खुले तौर पर प्रगतिशील निर्णय है।... पर क्या यह सही है कि उसी पीढी के मंगलेश डबराल का काम अरुण कमल से बेहतर और अधिक रहा है? श्री कमल से पिछली पीढी के रमेशचंद्र शाह, —कृष्ण बलदेव बैद, राजेंद्र यादव, और कमलेश्वर को वह नहीं मिला। कुल मिलाकर यह कि इस बार का पुरस्कार गैर साहित्यिक कारणों से किसी सुनिश्चित योजना के अंतर्गत दिया लगता है। यह दूसरी अधिक समर्थ —कृतियों को नज़र अंदाज करके दिया गया है।... अगर हमारे जिम्मेदार और वरिष्ठ लेखक-निर्णायक ऐसा निर्णय लेते हैं तो हमें यह जानने का हक है कि उसका ठोस आधार क्या है, कितनी देर, किन —कृतियों पर बहस हुयी?
      'अब चूंकि ज्यादातर पुरस्कार पद, पहुंच और संभवतरू पार्टी (दारु आदि की भी, राजनीति की भी) और अन्य कारणों से अंजाम पाते हैं, मात्र उत्—श्रेष्ठ लेखन से नहीं। सो गांव, देहात, छोटे कस्बे और शहरों के लेखक या बिना पहुंच के लेखक उस सूची में आ ही नहीं पाते। दूसरी ओर ढेरों पुरस्कारों के घूरे पर बैठे महालेखकों का लेखन आज कहां है, पता भी नहीं चलता। -संजीव(समकालीन साहित्य समाचार- जन.98)
साल 2009 के लिए अमरकांत और श्रीलाल शुक्ल को संयुक्त रुप से ज्ञानपीठ पुरस्कार दिए जाने की घोषणा और पुरस्कार राशि को सात लाख के बजाय पांच-पांच लाख किए जाने का निर्णय पहली नजर में भारतीय ज्ञानपीठ की यह उदारता प्रभावित करती है। लेकिन तीन लाख का नुकसान सहते हुए भी ऐसा किया जाना न केवल नैतिक रुप से गलत है बल्कि राशि के आधी या कम किए जाने का प्रावधान अगर पहले से घोषित नहीं है तो फिर संवैधानिक रुप से नियमों का उल्लंघन भी है। साल 1999 में निर्मल वर्मा और गुरदयाल सिंह के बीच भी आधी- आधी राशि बांटी गयी थी,तब भी इस पर विवाद हुआ था और इसे अनैतिक करार दिया गया था।
हिंदी की जानी मानी लेखिका —कृष्णा सोबती आज भी ज्ञान पीठ पुरस्कार से दूर हैं . दिल्ली के साहित्यिक गलियारे की बात मानें तो उन्हें पिछले साल ही ज्ञानपीठ सम्मान मिल जाता लेकिन ज्ञानपीठ के निदेशक और नया ज्ञानोदय के सम्पादक रवींæ कालिया से नाराजगी के चलते उनका पत्ता काट दिया गया. तब निर्णायक समिति में शामिल ' तदभव ' के सम्पादक एवं लेखक अखिलेश ने अन्य सदस्यों को लेखक श्रीलाल शुक्ल के पक्ष में प्रभावित किया और उन्हें ऐसा करने में सफलता भी मिली.
'विजय राय ने लमही के माèयम से अब तक प्रेमचंद के सम्मान की रक्षा की है। इस बार का पुरस्कार मनीषा कुलश्रेष्ठ को कैसे दिया गया, यह बात मेरी समझ में नहीं आई। एक तरफ़ आप शिवमूर्ति को सम्मानित करते हैं और दूसरी तरफ़ मनीषा कुलश्रेष्ठ को। पुरस्कार में एजग्रुप भी तो मायने रखता है। मैं कहूंगा कि यह जल्दबाज़ी में लिया गया है फ़ैसला है। वरिष्ठ और कनिष्ठ का अंतर समझना चाहिए। हिंदी साहित्य में चरम अराजकता फैली हुई है। मनीषा को स्टार बना कर उन की हत्या की जा रही है। सृजन का नाश कर दिया गया। लेखकों के लिए ज्यादा प्रशंसा ठीक नहीं है। ऐसा न हो कि स्टार लेखिका बता कर पंकज सुबीर मनीषा की हत्या करा दें और इस का भागी लमही बन जाए। - संजीव, वरिष्ठ कथाकार (फ़ेबु 170913वाया जय प्रकाश मानस स्टेटस)
(ऊपर के सारे वक्तव्य विभिन्न पत्रिकाओं और फेसबुक से साभार)
संजीव के इस बयान के पक्ष और विपक्ष में बहुत सी टिप्पणियां सोशल मीडिया फेसबुक पर पढने पर अन्य कारणों में न जाते हुए मैं उनके पर मनीषा कुलश्रेष्ठ-प्रकरण के इतर ' वरिष्ठ और कनिष्ठ का अंतर समझना चाहिए। कथन पर ही अपनी बात रखना चाहूंगा। इस कथन पर बहुत से मित्रो ने आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा है कि प्रतिभा कोर्इ वरिष्ठ- कनिष्ठ नहीं होती, अकादमियों द्वारा दिए जानेवाले जिस में केंद्रीय साहित्य अकादमी के भी बहुत से प्रकरणों के बाद हुए वाद-विवादों के मददेनजर बहुत हद तक मैं संजीव जी की बात से सहमत होते मैं कहना चाहूंगा कि सही है प्रतिभा कोर्इ वरिष्ठ- कनिष्ठ नहीं होती लेकिन प्रतिभा के प्रतिभा दर्शानेवाले कार्यों को रेखांकित करनेवाले उदरण तो हों जो कहीं रेखांकित किए गए हों, सोने को आभूषण रूप में आने से पूर्व किन- किन तापों को सहना, प्रकि्रयाओं से गुजरना होता है, सब जानते हैं। अनुभूति को समय के चाक पर भाषा, षिल्प और शैली मिश्र माटी से रचयिता अपनी रचना को आकार ही नहीं देता उसे आलोचकों-पाठकों की भटटी में पकने के लिए छोड़ता भी है। वे ही तय करते हैं कि क्या और कैसा रचा गया है। या सिर्फ पुरस्कारों के लिए सबमिट छपी कृति को ही अप्रतिम घोषित कर उसे पुरस्कृत कर एक नए नाम को टपका कर हलचल मचा नाम कमा लिए जाएंगे? केवल एक रचना या कृति जो निर्णायकों के अलावा कभी किसी पाठक के बीच न आई हो, सीधे नामित, पुरस्कृत हो जाए यह तो अति ही कहा जाएगा, लेखकीय प्रतिभा कोई विज्ञान का आविष्कार तो है नहीं कि अचानक प्रस्फुटित हों और चारों ओर अपना चमत्कार दिखाने लगे। एक बार मान भी लिया जाए कि ऎसा है तो भी उनका सच भी यही है कि वे भी न जाने कितने- कितने प्रयोगों के असफल होने के बाद सफलता का मूंह देख पाते हैं। 
मेरे दृष्टिकोण को पुष्ट करनेवाले उपरोक्त सभी संदर्भ बताते हैं कि अकादमी चूंकि हम सब की है, पूरे देश के साहित्य का दर्पण मानी जाती है और जवाबदेह है, अकादमी अध्यक्ष को इस में होनेवाली गतिविधियों, निर्णयों की गरिमा और समग्र शब्द समाज में विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए पुरस्कार, संयोजन चयन प्रकि्रया पर उठने वाले विवादों, सवालों के मददेनजर गंभीरता से मंथन करते हुए कदम उठा वे सभी उपाय करने चाहिए जिससे शब्द से सरोकार रखनेवाले सच्चे शब्द साधकों में अकादमी के प्रति डगमगाते विश्वास में दृढता लौटे।
इस संदर्भ में सुझाव (1) तो यह हो सकता है कि किताबों की आधार सूची ( ग्राउंड लिस्ट) संयोजकों, सदस्यों, मान्यताप्राप्त सदस्यों की बजाय राजा राममोहन राय ट्रस्ट की तरह पूरे देष के प्रकाषकों से सीधे विभिन्न भाषाओं-विधाओं की पुस्तक सूची मांग अपने पास उपलब्ध लेखक परिचय कोश(who's where)   की सहायता से देश भर के लेखकों या प्रदेशों की अकादमियों के पास उपलब्ध उनकी लेखक सूचियों, परिचय कोश से निर्णायक पैनल बना सीधे उन्हीं से अनुशंसा मांगी जा सकती है, और  यह सब गोपनीय हो और इसकी जरा भी भनक संयोजकों, मण्डल-सदस्यों को न लगे। इसके अलावा जिस प्रकार अकादमी पुरस्कारों के लिए हर वर्ष प्रेस-विज्ञपित जारी करती है, उसी प्रकार उस वर्ष प्रकाशित उन विधाओं जिन में जिस भाषा में पुरस्कार दिए जाने है, हेतु भी सीधे प्रकाशकों, लेखकों से सीधे कृतियां आमंत्रित कर सकती है जैसा अभी नवसृजित पुरस्कारों युवा लेखन- बाल साहित्य के लिए यही प्रकि्रया अपनायी जा रही है। (2) संयोजक की चयन प्रक्रिया भी बड़ी बेतुकी और गलत है कि जानेवाला संयोजक, आनेवाले संयोजक का चयन करेगा...ये कोई विरासत नहीं है जिसका कि  जिसकी वसीयत कर उत्तराधिकारी घोषित किया जाए, यह गलत प्रक्रिया तुरंत प्रभाव से बदली जानी चाहिए। (3) मान्यता प्राप्त संस्थाओं की समीक्षा की जानी चाहिए, पड़ताल हों कि उन संस्थाओं की वास्तविकताएं क्या हैं, उसे चलानेवाले कौन हैं, उनकी कहां- क्या सक्रियता है... आरोप हैं कि अकादमी में मान्यता प्राप्त अधिकतर संस्थाएं जेबी हैं और ये सिर्फ संयोजक, पुरस्कार चयन में  वोट- बहुमत दिलाने की भूमिका निभाती हैं। मान्यता के मानदंडों पर पुन: विचार कर, सुधार कर नयी- नयी संस्थाओं को अधिक से अधिक संबद्ध किया जाना चाहिए जिससे राज्य सभा की तरह अकादमी में खेले जानेवाले वोटिंग के कुत्सित खेल से बचा जा सके। (4) पुरस्कार हेतु चयनित कृति के साथ कृतिकार के पूरे साहित्य के क्षेत्र में अवदान को भी दृष्टिगत रखा जाना चाहिए, अगर न  हो तो उसी सिथति में कृति- कृतिकार को पुरस्कार हेतु चयनित किया जाना चाहिए जिसमें आधार बहुमत नहीं, निर्णायकों की सौ प्रतिशत सहमति हो कि वाकई यह अप्रतिम और विरल कृति- कृतिकार है, अगर इसे पुरस्कृत नहीं किया गया तो पूरे साहित्य जगत का नुकसान होगा और हम सब ही इस भूल के खलनायक होंगे। (5) यह भी किया जा सकता है कि अकादमी-अध्यक्ष वर्तमान पुरस्कार चयन प्रक्रिया में कमियों और उनके कारण उठने वाले समय-समय विवादों के मददेनजर चयन प्रक्रिया, नियमों के समीक्षार्थ व उस में अधिक से अधिक पारदर्शिता हेतु बदलाव- सुझावों हेतु जैसे अकादमी साहित्यिक गतिविधियों हेतु सेमिनार- कार्यशालाएं आयोजित करती है, इस हेतु भी एक सेमिनार या बैठक आयोजित कर अकादमी से मान्यता प्राप्त विभिन्न भाषाओं के विद्वानों को आमंत्रित कर इस विषय पर विशद चर्चा कर उस में प्राप्त सुझावों के आधार पर नए नियम और मानदण्ड निर्धारित करे और उन्हें भी लागू करने से पहले साहित्य समाज के समक्ष अवलोकनार्थ रखें जिससे उन में रह गयी कोई कमी और आपत्ति अगर हो तो उसका निस्तारण हो सके। (6) एक तुरंत उपाय यह भी हो सकता है कि जिस भाषा के पुरस्कार या उससे संबद्ध अन्य योजनाओं पर अंगुली उठे या विवाद हो, निर्णयों की त्वरित गति से जांच कर तथ्यों का पता लगाकर यदि हो रही अनियमितताओं सम्बन्धी शिकायतें सही पायी जाएं तो अध्यक्ष अपनी संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग कर उस भाषा के परामर्श मण्डल को संयोजक सहित भंग कर नए मण्डल का गठन कर सकते हैं।  अगर ऐसा एक- दो बार होगा तो इसके बहुत ही सार्थक और स्वस्थ परिणाम आ सकते हैं और काफी दाग धुल सकते हैं भविष्य के लिए भी एक स्वस्थ राह बन सकती है.. एक संदेश हासिल होगा... मेरी ऐसी सोच है। (7) निर्णायकों के पैनेल में आए नामों को सीधे ही चयन करने की बजाय उनके बायोडेटा मंगा उस भाषा में उनके अवदान और सिद्धस्ता की जांच की जानी चाहिए क्योंकि पुरस्कार चयन में निर्णायक की भूमिका ही सबसे महत्त्वपूर्ण और अहं होती है वे ही समस्त विवादों के सूत्रधार होते हैं ( ज्वलंत उदाहरण 'लमही सम्मान) और वे ही गौरनिवत करनेवाले। (8) परामर्श मण्डल के चयन में भी सावधानी बरतते हुए उनके साहित्यिक अवदान को ध्यान में रखते हुए सदस्य चयन होना चाहिए वर्ना तो आगे भी वही होगा जो अब तक होता आया है और आज हो रहा है।   
अकादमियों में व्याप्त उक्त विडंबनाओं और विवादों को देखते हुए अकादमी-अध्यक्षों को चाहिए कि तुरंत विद्वजनों का एक पैनल गठित कर प्रस्तावित सुझावों के मददेनजर या इन से भी बेहतर कोई प्रस्ताव, नियम- प्रक्रिया निर्धारित करने की पहल करें जिससे अकादमी पुरस्कारों और अन्य काम-काजों के तौर- तरीकों पर उठने विवादों के कलंक से निजात पायी जा सके। इस संचार क्रांति युग में जहां कुछ भी छुपाना संभव नहीं रह गया है, आज गोपनीयता के नाम पर अपनी मनमर्जी करना असंभव नहीं तो दुरुह जरूर हो गया है। हर क्षेत्र में पारदर्शिता लाने की वकालत की जा रही है, समय आ गया है कि अकादमियां भी अपने ढंग- ढर्रे में सुधार करें और जिससे अकादमी के परामर्श मण्डल के माननीय सदस्य दूलाराम सहारण जी अकादमी की किसी योजना के अंतर्गत किसी लेखक द्वारा भेजे गए प्रस्ताव की स्वीकृति या अकादमी द्वारा पुरस्कृत किए जाने के बाद तानशाही अंदाज में अहसान जताते हुए जैसे कि अकादमी का अर्थ वे और उनके आका ही हैं,किसी नवनीत पाण्डे को 'आपको अनुवाद कार्य किस की कृपा से मिला था (भले ही 1999 के प्रस्ताव पर 2006 में प्रकाषन को भी वे अपना अहसान बता अपने आपको गौरानिवत महसूस करते हैं) जता कर हड़का सके।
मित्रो! समय आ गया है देष की विभिन्न अकादमियों में जमे इन साहित्य माफियाओं, ठेकेदारों के चुंगल से साहित्य को मुक्त कराने का पूरा लेखक समाज अपने निजी और छोटे-मोटे हितों से ऊपर उठ अपनी क्षमताओं के अनुरूप एकजुट हो सक्रिय और प्रभावी प्रयास करें। अगर ईमानदारी की चाह है, तो खुद को भी, पूरा नहीं तो थोड़ा- बहुत ईमानदार तो होना ही होगा।

नवनीत पाण्डे
'प्रतीक्षा2 - डी -2, पटेल नगर,
 बीकानेर -334003 (राज.) 

Tuesday, 20 August 2013

स्वस्थ बहस की शुरूआत ही अकादमियों की मनमर्जी पर लगा सकेगी अंकुश- दूलाराम सहारण

मेरी बात -


मित्रो! बीच-बहस में "तो असल बात और पीड़ाएं ये हैं" पोस्ट के प्रत्युत्तर में मित्र दूलाराम सहारण ने बीच-बहस के लिए "स्वस्थ बहस की शुरूआत ही अकादमियों की मनमर्जी पर लगा सकेगी अंकुश"शीर्षक से ये आलेख भेजा है इस आग्रह के साथ कि इसे ज्यों का त्यों छापा जाए। बीच-बहस मंच ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए है अत: उनका आलेख ज्यों का त्यों यहां दिया जा रहा है ताकि बात एक तरफ़ा न लगे। 
दूलाराम जी का आभार कि उन्होंने मुझे कुण्ठाग्रस्त घोषित किया है..कुछ तो सोचकर ही यह फ़तवा दिया होगा। अस्तु! उनके इस आलेख में उनके द्वारा किए एक रहस्योद्घाटन, खुलासे से कम से कम उन आरोपों को बल मिलता है, और सच्चाई ध्वनित होती है कि अकादमी चाहे केंद्र की हो या राज्य की पारदर्शिता, निर्णायक एक पर्दा है दो नम्बर के कामों को एक नम्बर में बदलने का। उनके इस आलेख से ही मुझे पता चला कि केदारनाथ अग्रवाल की जन्मशती पर भेजा गया मेरा अनुवाद प्रस्ताव स्वीकृत हुआ है जबकि अकादमी की ओर से मुझे आज तारीख तक कोई विधिवत सूचना नहीं है। इससे एक कड़वा सच और सामने आता है कि पूरे राजस्थान से बरसों से न जाने कितने लेखकों के प्रस्ताव स्वीकृत हो फ़ाइलों में दफ़न हो जाते होंगे या वे कछुआ चाल से न जाने किस वजह से लेखकों तक पहुंच भी पाते होंगे कि नहीं(ऎसे उदाहरणों, हादसों की भी कमी नहीं कि अनुवाद की स्क्रिप्ट लेखक द्वारा समय पर अकादमी को प्रेषित कर दिए जाने के बावजूद जब तक वहां नियुक्त हमारे महामहिम प्रतिनिधियों की हरी झंडी न मिले प्रेस के दर्शन ही नहीं कर पाती और ऎसी कृति भी प्रेस जाने की चर्चाएं आम हैं जिनके प्रस्ताव ही बाद में प्रस्तुत और स्वीकृत कराए गए हैं, ऎसा है या नहीं इसका खुलासा तो दुलाराम जी बता सकते हैं।) यही हश्र केंद्रीय अकादमी अनुवाद कर भेजी जा चुके उन लेखकों के साथ होता रहा जो कि गुडबुक में नहीं होते। 
बहरहाल जिस सच और आरोप की ओर मैं संकेत कर रहा था और दया-अहसान की तरह मुझे स्मरण कराया गया है,"यह बताते चलिए कि साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली से आपको महाश्वेता देवी (1084 की मां) और केदारनाथ अग्रवाल (अपूर्वा) की रचनाओं के अनुवाद कार्य किसने दिलवाए?" उनकी इस दंभोक्ति से मेरे ऊपर कहे गए ’पारदर्शिता, निर्णायक एक पर्दा, ढोल है जिसकी असल पोल ये है कि ऎसे दो नम्बर के कामों को आसानी से अपने चाहे अनुसार एक नम्बर में बदल लिए जाते हैं।’ की सत्यता पुष्ट होती है। इस खुलासे से यह भी ज़ाहिर होता है कि लेखक को कतई ये भ्रम नहीं पालना चाहिए कि वह या उसकी कृति कुछ है। अकादमियो में जो हमारे हैं वे ही सब-कुछ हैं, उनकी मर्ज़ी के बिना पत्ता तक नहीं हिलता। महाश्वेता देवी के जिस उपन्यास के अनुवाद कार्य श्री देवल, तिवाड़ी की कृपा से दिलाए जाने के काले सच का खुलासा दूलाराम जी ने किया है, मुझे इसकी बिल्कुल भी जानकारी नहीं थी, आम लेखकों की तरह हम भी इसी भ्रम में थे कि केंद्रीय अकादमी में साफ़- सुथरा और कायदे- कानून और लेखक और कृति के अनुसार उसके लिए बनी विद्वानों की निर्णायक मण्डल के अनुमोदन और सम्मति से होता है, यह तो इस आलेख से पता चला कि वहां भी निर्णय और निर्णायक सिर्फ़ दिखावे मात्र के होते हैं असली पावर तो इन्हीं हाथों में होता है। 
रही बात 1084वें मां-महाश्वेता देवी के उपन्यास के राजस्थानी अनुवाद की तो मैं बता दूं कि ’1084वें की मां’ अकादमी द्वारा पुरस्कृत कृति नहीं थी, पुरस्कृत कृति तो (aranyer adhikar) अरण्येनेर अधिकार थी लेकिन चूंकि ’1084वें की मां’ महाश्वेता जी की सर्वाधिक चर्चित और प्रसिध्द कृति है जिस पर इसी नाम से गोविंद निहलानी फ़िल्म भी बना चुके थे, मुझे लगा राजस्थानी में भी इसे होना चाहिए, इसीलिए मैंने आप ही की तरह महाश्वेता जी से अनुमति लेकर अपने ही स्तर पर इसके अनुवाद का कार्य शुरु किया, बाद में किसी मित्र के सुझाव पर ही प्रस्ताव अकादमी भेजा था, मुझे ज़रा भी इल्म नहीं था कि यह प्रस्ताव अकादमी नहीं, देवल और तिवाड़ी साहब स्वीकृत करने वाले हैं और अपने इन शब्दों में जैसा कि दूलाराम जी बता रहे हैं, उन्होंने मेरे एक और प्रस्ताव पर अपनी नज़रें इनायत कर उसे स्वीकृत किया है जिसकी मुझे आज तक अधिकारिक सूचना नहीं है,आएगी तो मैं उसे इस मंच से अस्वीकार करने की घोषणा करता हूं.... 1084वें री मा" जैसे-तैसे कैसे छपी और इसके लिए इतिहास में नहीं जाऊंगा न ही इस इतिहास में जांऊगा कि प्रकाशन के बाद अनुवाद पुरस्कार अवधि में उस पर क्या-क्या और क्यों बीती।    
दूसरा आरोप मेरे द्वारा चर्चाओं से पलायन करने का लगाया है, पिछले दो सालों से जब से उन्होंने एक तरफ़ा आक्रमण का मोर्चा संभालते हुए जो कुछ लिखा है, फ़ेसबुक पर पढनेवाले अच्छी तरह जानते होंगे पूरे राजस्थान से सिर्फ़ नवनीत पाण्डे ने ही उनकी अधिकतर पोस्ट पर सवाल- जवाब किए हैं। और दूलाराम जी की तरह किसी प्रतिकूल दिखनेवाली अपनी स्वयं की पोस्ट को और उस पर मेरी टिप्पणी को डिलीट नहीं किया है। राजस्थान में साहित्य अकादमियों के अध्यक्षों के नामों की घोषणा के साथ ही आपने उनके खिलाफ़ एक शर्मनाक मुहिम शुरु की थी, महिने- दो महिने भड़ास निकाल कर आप ही गधे के सिर से सींग की तरह फ़ेसबुक से गायब हो गए थे और जैसे ही राजस्थानी अकादमी के पुरस्कारों की घोषणाएं हुई, आप अचानक फ़िर अपने उसी राग के साथ अवतरित हो गए.. नवनीत पाण्डे कहीं नहीं गया....अस्तु!
आपने अपनी विद्वता से अपनी जिन प्रतिभाओं और विविध क्षेत्रों में उपलब्धियों के साथ बड़े- बड़े भामाशाहों, कारोबारियों के सहयोग से अपने द्वारा किए, कराए गए जिन महान, ऎतिहासिक कार्यों को अपनी बड़ी सोच के साथ क्रियान्वित करने का जो यशोगान गाया है, उनके लिए ह्र्दय की अतल गहराइयों उनका हार्दिक अभिनंदन और स्वागत और कामनाएं कि आप अपने अभीष्ट  की प्राप्ति के लिए इसी ऊर्जा से जुटे रहें और अपने परिवेश को हर तरह से समृध्द करते रहें। और उस संजीवन प्रयत्न के लिए भी पूरे राजस्थान के लेखक समुदाय की तरफ़ से भी आप विभूतियों का आभार कि आप सुनील गंगोपाध्याय से मिले और उन्हें राजी कर आप के सद्र्प्रयासों से सभी भारतीय भाषाओं के साथ-साथ राजस्थानी को भी नए पुरस्कार दिला अपने कर्त्तव्य का निर्वाह कर प्रदेश का गौरव बढाया। पूरा राजस्थान व राजस्थानी आपकी कृतज्ञ है। आपने कहा अभीष्टों से मोहवश एक- दो नाम दो बार लिख दिए गए, मुझे उससे कोई शर्म नहीं, हमारे लिए तो सभी अभीष्ट हैं, कभी किसी से दुश्मनी का खयाल तक नहीं आता..सभी मित्र हैं, मतभेद हो सकते हैं, मनभेद किसी से नहीं.. ऎसे में अगर कोई नाम दोबारा आ गया तो आ गया..आखिर इंसान हैं भई, कंम्यूटर तो नहीं कि हमें तुरंत सुधार दें, आपके ध्यानाकर्षण से आलेख को संपादित कर दिया है लेकिन इससे सच और संदर्भ प्रभावित नहीं होंगे। और भी कोई लिपिकीय भूल रह गयी हो तो अवश्य बताएं.. हम अभी अपरिपक्व और नए हैं इस क्षेत्र में, सीखते- सीखते सीखेंगे।
अंतिम आरोप कि मैंने आलेख में जिन बातों की ओर इशारा किया वे गोडाघड़ेड़ी है, इन में कुछ भी सही नहीं। चलो, आपकी ये बात मान लेते हैं, बावजूद इसके कि ये सभी कड़वे सच हैं जिन से राजस्थानी में थोड़ी बहुत कलम चलानेवाले हर लेखक परिचित हैं और इसके लिए मुझे नहीं लगता कि किसी दस्तावेज़ी सबूत की जरूरत है।अगर नवनीत पाण्डे की सारी बातें गोडेघड़ेड़ी है या सच। इसका फ़ैसला इन बातों को पढनेवालों सुधि लेखकों और पाठकों पर छोड़ दीजिए न। उस यथार्थ को गोडाघड़ेडी कहकर कब तक, कहां तक छुपाया जाएगा जो है, सबके सामने हैं और जिससे सब वाकिफ़ हैं। मैं अपनी पसंद की सूची बनाऊं! मेरी औकात कहां! ये महाकर्म तो गुणीजनों, बिरले विद्वान व्यक्तित्वों को ही शोभा देते हैं और आप लोगों से बढकर ईमानधर्मी, नैतिक मूल्यों के संस्थापक गुणीजन विद्वान कौन?  आप के आकलन और कथनानुसार बाकी सब तो भ्रष्ट, निकृष्ट और पाप के घड़े हैं...
-नवनीत पाण्डे


bhai jee, kuchh metter hai. sidha post nahi  ho raha. kripiya jyu ka tyu beech-bahas me dene ka shrm kren.. sadar....                    
स्वस्थ बहस की शुरूआत ही अकादमियों की मनमर्जी पर लगा सकेगी अंकुश- दूलाराम सहारण
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संदर्भ: नवनीत पांडे के ब्लॉग बीच-बहस की पोस्ट

भाई नवनीत जी, आपने काफी स्वस्थ बहस शुरू की है। राज्य में स्थित राजस्थानी अकादमी की नादरशाही के खिलाफ बात शुरू की तब से मैं ऐसी बहस की अपेक्षा कर रहा था। मैं बार-बार कह रहा था कि अकादमी के कारिंदे चुप क्यों है? अकादमी को बोलना चाहिए। अगर हम सही को गलत ठहरा रहे हैं तो अकादमी अपना पक्ष रखे। पाठक स्वयं तय कर लेगें कि कौन सही कह रहा है और कौन गलत? खैर.... किसी दूसरे के बहाने देर आए दुरस्त। 
नवनीतजी, मैं आपकी इस बहस का स्वागत करता हूं। साथ ही राजस्थानी साहित्य की समझ रखने वाले तथा फेसबुक, ब्लॉगिंग से जुड़े सभी विद्वान, साथियों से आग्रह करता हूं कि वे इस बहस में हिस्सा लें। अपनी बात बेबाकी से रखें। ताकि अकादमियों की दशा-दिशा सुधरे और अकादमियों के कर्ताधर्ता जो बनते हैं वे कुछ भी गलत करने से पहले दो बार सोचें।
नवनीत भाई, बात यहां राज्य अकादमी और केन्द्रीय अकादमी की नहीं है। बात अकादमियों में होने वाले अपने-पराये, जात-मुसाहिबा, बजट-चैपट आदि की है। इसलिए दोनों अकादमियों की गतिविधियों पर खुली बहस होनी चाहिए। मैं आपकी तरह कुण्ठाग्रस्त नहीं हूं। मेरे लिए दोनों अकादमियां समान है। क्योंकि किसी भी अकादमी ने व्यक्तिशः मुझे कहीं उपेक्षित नहीं किया। हां, आपकी बात सही मानें तो एक अकादमी ने मुझे बेहिसाब उपकृत भी किया है। यहां, आपकी इस बात के मायने समझता हूं और आपके इर्द-गिर्द कैसे संकेत आ रहे हैं, पल-पल की खबर भी इन दिनों रखता हूं। 
मुझे कहते हुए दुख है कि जो कायर खुद कहने में असमर्थ हैं, आरापों को सहन करने की हिम्मत नहीं रखते व चर्चाओं से पलायन कर जाते हैं, उनकी भाषा को पढकर किसी दूसरे को ही जवाब देना पड़ रहा है। खैर.... फिर भी हम यह स्वीकार कर रहे हैं। 
हां, मैं यहां मेरा पक्ष नहीं रखना चाह रहा था। क्योंकि खुद को कहीं दोषी नहीं पाता। परंतु बात विवादित बनाने के लिए ही उठी है तो मैं कुछ कहना चाहूंगा। और विवादित होने से डरूंगा नहीं। यहां मैं तो श्री चंद्रप्रकाश देवल की खुले दिल से प्रशंसा करूंगा कि उन्होंने युवाओं की अहमियत को समझा और साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली में पहली दफा उनके माध्यम से युवाओं की दखल हुई। मैं एडवायजरी में गया। शायद राजस्थान से पहली दफा 30 के इर्दगिर्द का कोई युवा गया होगा। अबकी बार 30 के इर्दगिर्द का युवा ओम नागर, कोटा गया है। अगली दफा और कोई युवा होगा। कोई नहीं होगा तो हम पुरजोर युवा को लाने का प्रयास करेंगे। एडवायाजरी की ऐसी शुरूआत में अगर कहीं मैं ‘दोषी’ हूं तो वह दोष स्वीकार करता हूं और ऐसे दोष बार-बार करने की हामी भरता हूं। मैं तो एडवायजरी बनाने वालों से भी निवेदन करता हूं कि वे ऐसे ‘दोष’ सहन करते रहें। क्योंकि बुर्जुगों के अनुभव और नई सोच का समन्वय कहीं न कहीं तो भाषा का हितकारक ही होगा। 
हां, नवनीतजी, मेरे एडवायजरी में जाने से क्या लाभ-नुकसान हुआ, यह आप ही बताइगा। क्योंकि आपकी जबान कहूं तो मुझे नुकसान दीखते नहंी और लाभ गिनाकर मेरे काम को मैं छोटा नहीं करना चाहता। हां, आप बता सकते हैं और में प्रत्युत्तर के लिए सदैव तत्पर हूं। आपके शार्गिदों की तरह मांद में नहीं छिपने वाला।
एडवायजरी मेंबर की हैसियत से मेरे सभी काम हुए, ऐसा नहीं। कुछ पर सहमति नहीं बनी। जिन पर सहमति नहीं बनी, उनके मैंने चूरू आकर अपने संसाधनों से पूरा किया। पूरा दमखम झोंककर।
रही बात युवा पुरस्कार की- आपको शायद ध्यान नहीं है कि राजस्थानी में पहला युवा पुरस्कार मेरे ही प्रयास से कमला गोइन्का फाउण्डेशन, मुम्बई ने शुरू किया। फाउण्डेशन मेरी व्यक्तिशः कुछ मदद करना चाहता था। तब मैंने उन्हें यह सुझाव दिया कि मुझे तो आप सहयोग दे देंगे परंतु राजस्थानी में जो दूसरे युवा काम कर रहे हैं उनको कौन सहयोग देगा? तब उन्होंने हामी भरी और श्री किशोर कल्पनाकांत का नाम जैसे ही मैनंे उनको सुझाया, युवा पुरस्कार शुरू हो गया। इस सारी प्रक्रिया के मेरे पास लिखित दस्तावेज हैं। आप चाहें तो देख सकते हैं। यह पुरस्कार 2007 में श्री उम्मेद धानियां, 2009 में श्री मदन गोपाल लढा, 2011 में सुश्री कीर्ति परिहार को मिल चुका है और अब 2013 के अक्टूबर में एक और युवा को मिलने जा रहा है। 2013 के पुरस्कार का एक निर्णायक में भी था।
किशोर कल्पनाकांत युवा पुरस्कार के बाद फतेहपुर शेखावाटी के धानुका सेवा ट्रस्ट ने मेरे ही निवेदन पर युवा पुरस्कार शुरू किया, जोकि श्री देवकरण जोशी, कुमार अजय, सतीश छींपा सहित मुझको भी मिल चुका है। दोनों समारोह में आपके ‘आका’ आए हुए हैं, उनसे पूछ सकते हैं।
साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष श्री सुनील गंगोपाध्यायजी के यहां युवा पुरस्कार के संबंध में हम कई दफा गये। आप जब जानेंगे तब महसूस करेंगे कि श्री चंद्रप्रकाश देवल की भूमिका अगर वहां नहीं होती तो युवा पुरस्कार प्रारंभ पता नहीं होता कि नही भी होतां? 
साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली की पहल के बाद हमारी अकादमियां जांगी और उदयपुर तथा बीकानेर से युवा पुरस्कार शुरू हुए। परंतु, दुर्भाग्य आयु और जाति निर्धारण का वहां विवादित साया रहा। 
मैं तो अखिल भारतीय मारवाड़ी सम्मेलन, लखोटिया ट्रस्ट, राना के साथ-साथ दो-चार और प्रवासियों के निरंतर संपर्क में हूं। आपको जल्दी ही राजस्थानी में कई युवा पुरस्कार और देखने को मिलेंगे। हमारी भाषा में अब युवा पुरस्कार की कितनी अहमियत है, यह भी बताऊंगा।
हां, मेरा सौभाग्य है कि पहली दफा साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार मुझे मिला। पुरस्कार ज्यूरी में श्री नंद भारद्वाज, कुंदन माली, कमल रंगा थे। प्रक्रिया में श्री ओम नागर, मदन गोपाल लढा, विनोद स्वामी, दुलाराम सहारण थे। ज्यूरी ने सर्वसम्मति से फैसला मेरे पक्ष में किया। लिखित दस्तावेजों के बहाने यह सारी बातें सार्वजनिक है। फिर भी आप मानते हैं कि गलत हुआ? तो आपकी बात के मायने निकाले जा सकते हैं। 
फिर तो आप इस बात के मायने भी साथ में जोडि़एगा कि साहित्य अकादेमी के बाल साहित्य पुरस्कार प्रक्रिया में मेरी पुस्तकें लगातार तीन साल ज्यूरी के सामने जाती रही। फिर भी पुरस्कार नहीं मिला। क्या कारण रहा? बताएंगे तो मेहरबानी होगी।
हां, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली की पारदर्शिता देखिएगा- अकादेमी की ज्यूरी पुरस्कार के साथ् ही ‘पुरस्कार गत’ घोषित की जाती है। अपनी राज्य अकादमी की तरह सूचीगत नहीं। इस बहस से पहले हम राज्य अकादमी से यह भी मांग कर रहे थे कि पुरस्कारगत अकादमी निर्णायक बताए ताकि वे गलत निर्णय करते हैं तो कटघरे में आएं। तय मानिए कि निर्णायकों को अगर सार्वजनिक होने का आभास होगा तो ऐसे में वे अकादमी अध्यक्ष का दबाव सहन नहीं करेंगे। 
इसी संदर्भ में आपको स्मरण करवा दूं कि ‘रावत सारस्वत साहित्य पुरस्कार’ कभी हम दिया करते थे (2009 में कमला गोइन्का फाउण्डेशन द्वारा ‘रावत सारस्वत पत्रकारिता सम्मान’ शुरू करने तक।) तब हम उस पुरस्कार के तीनों निर्णायकों के निर्णय पत्रक की छायाप्रति निर्णय के साथ भेजते थे। किसी से पूछ लीजिएगा। लाभ यह था कि निर्णायकों को पता रहता था कि निर्णय पत्रक सार्वजनिक होंगे और ऐसे में आयोजक संस्थान निर्णायकों से सही निर्णय पाता था। आप बताइए राज्य अकादमी ऐसा क्यों नहीं कर सकती? राज्य अकादमी कार्यसमिति के सदस्यों को प्रत्येक पुरस्कार में एक-एक निर्णायक की हैसियत से क्यों घुसेड़ती है? और एक निर्णायक के एकतरफा अंकों का निर्णय में क्या महत्त्व होता है, आप जानते हैं। अकादमी को अगर ऐसा ही करना है तो लेखकों से किताब न मंगावाए और जिसको पुरस्कार देना है वह कार्यसमिति को बैठक करके सर्वसम्मति से घोषित कर दे। जैसा कि हमारा प्रयास संस्थान ‘घासीराम वर्मा साहित्य पुरस्कार’ में करता है- बिना पुस्तक मंगाए, अपने-अपने सुझाव के बाद किसी एक रचनाकार का नाम तय। नुकसान कहां है? क्यों प्रविष्ठियां मांगने का नाटक करती है राज्य अकादमी?
हां, आपने मुझ पर यह व्यंग्योक्ति की- (चूंकि ये राजनैतिक पृष्ठभूमि से साहित्य के मैदान में आए हैं, इन से ऐसी अपेक्षा करना कोई आश्चर्य नहीं।)
नवनीतजी, मैंने फेसबुक पर आपको पहले भी कई दफा कहा है कि कुछ लिखने से पहले तथ्य को जांच लिया करें। इससे आपकी हास्यास्पद स्थिति नहीं बनती। आप वक्त-वक्त पर ऐसी हास्यास्पद स्थिति बनाकर चर्चाओं से दूर भाग जाते हैं। अब आग्रह है कि आप मेरे ब्लाॅग या वेबसाइट देखें। आपकी झूठ भरी यह व्यंग्योक्ति सामने आ जाएगी। नवनीत भाई, नवीं कक्षा में पढते थे तब राजस्थान पत्रिका समूह की ‘बालहंस’ में हमारी पहली रचना छपी थी। बी.ए. के दिनों में (तबतक छात्रसंघ महासचिव भी नहीं बना था) राज्य अकादमी ने महाविद्यालय स्तरीय पुरस्कार दिया था, उस वक्त राज्य के भैरोसिंहजी शेखावत मुख्यमंत्री थे। बाद में छात्रसंघ महासचिव बना और फिर अध्यक्ष। बाद में राजनीति के मार्ग। 
हां, राजनीति के साथ साहित्य कोई गुनाह है तो आप लक्ष्मीकुमारी चूंडावत, रेंवतदान चारण सहित बहुत सारे नाम हटा दीजिएगा अपनी सूची से, और इनमें से मौजूद लोग अगर कुछ भी कहें तो उनकी बातों को गंभीरता से मत लीजिएगा!!
अब राजस्थानी युवाओं की बात- राजस्थानी युवाओं की बात करेंगे तो बड़ी पीड़ा के साथ कहना पड़ रहा है कि राजस्थानी में पांच से सात के बीच ही सक्रिय युवा रचनाकार हैं, जिनको क्रमशः युवा पुरस्कार दिया जाना अकादमियों की मजबूरी होगी। अगर ऐसे ही हालात रहे तो अकादमियों समेत सभी संस्थाओं को अपने युवा पुरस्कार बंद करने पड़ेगे। मैंने पूर्व में जिक्र किया कि इस बार के किशोर कल्पनाकांत युवा पुरस्कार का एक निर्णायक मैं भी था। (निर्णय घोषित हो चुका है तब बता रहा हूं)। इस पुरस्कार में 35 वर्ष से कम के युवा की पांडुलिपि पर पुरस्कार दिया जाता है। आपको पीड़ा होगी कि नहीं परंतु हरएक राजस्थानी शुभचिंतक को यह जानकर पीड़ा होगी कि वहां सिर्फ और सिर्फ एक ही पांडुलिपि आई। कहां तैयार हो रहे हैं राजस्थानी लेखन में युवा? 
फाउण्डेशन ने कहा यह तो पुरस्कार प्रक्रिया ही नहीं हुई। या तो इस बार पुरस्कार किसी को नहीं दें या फिर हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर दें, क्योंकि हालत ऐसे ही रहने हैं। हमारे बड़े निवेदन के बाद उस एक मात्र प्रविष्टि पर पुरस्कार घोषित किया गया है। 
मुझ पर कुछ कहने से पहले 2015 के उक्त आगामी पुरस्कार तक पांच-सात युवाओं की पांडुलिपियां तैयार करवाइएगा, ताकि राजस्थानी का भविष्य सुरक्षित हाथों में जाए। युवा तैयार हों।
आगे चलकर साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली तथा राज्य अकादमी में यही हालात होंगे। राजस्थानी के संदर्भ में। देखते रहना। पांच से ज्यादा प्रविष्ठियां या नाम नहीं दीख रहे हमें तो। प्रविष्ठियों के सबूत गवाह हैं। तय मानिए, सबको मिलेगा बारी-बारी युवा पुरस्कार। ऐसी स्थितियों थी तब ही तो मैंने नीरज दइया और राज्य अकादमी के प्रकाशन उपक्रम ‘मंडाण’ की जी खोलकर प्रशंसा की थी। बहुत जरूरत है ऐसे प्रयासों कीं। अकादमी बहुत कुछ कर सकती है। हां, उसे भेदभाव मुक्त और अपने-पराये के मोह से दूर होना पड़ेगा।
हमारी क्षमता हमारे अंचल तक थी। हमें कहते हुए खुशी है कि आने वाले समय में चूरू से 10-15 ऐसे नाम राजस्थानी साहित्यिक समाज को दीखेगें, जो अब तैयार हो रहे हैं तथा कुछ ही समय में उनके जाने-पहचाने होंगे। क्या ऐसा प्रत्येक इलाके में नहीं हो सकता? परंतु, करे कौन? फेसबुक और ब्लाॅग पर बहस के बाद घर....। समय ही कहां होता है युवाओं की रचनाओं को सुधारने का, उनकी भाषाई समझ विकसित करने का? मुबारक आपको....।
हां, बीच में एक बात आपसे पूछ ही लूं। श्वसुर, दामाद, सरस्वती मानस पुत्र की शब्दावली आपकी ही है क्या? आपकी ही है तो फिर यह बताते चलिए कि साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली से आपको महाश्वेता देवी (1084 की मां) और केदारनाथ अग्रवाल (अपूर्वा) की रचनाओं के अनुवाद कार्य किसने दिलवाए? 
हां, अगर अनुवादक रचनाकार होने या कहलवाने से आपको परहेज है तो फिर ऐसे स्वयं के प्रस्ताव आप अकादमियों के पास क्यों भेजते रहे? अनुवाद कार्य वह भी छंदयुक्त करने का मादा नहीं है तो मालचंद तिवाड़ी का गीतांजलि अनुवाद उठाकर देख लीजिएगा। 
हां, साहित्य अकादेमी के पुरस्कार वंचितों की सूची आपने बड़ी ही मेहनत से बनाई है। बधाई। कुछ नाम तो अति मोह के कारण दो बार भी आ गए। यह आपका कसूर नहीं? मरते वक्त आदमी अपने इष्ट का ही बार-बार स्मरण करता है!!
भाई, सूची के बहाने मुद्दे को भटकाना पुरानी कला है। परंतु इसी कला के बीच आपसे भी सवाल करना वाजिब है। अबतक साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली से जिनको पुरस्कार मिले, उनकी सूची यह है-
श्री विजयदान देथा, मणि मधुकर, कन्हैयालाल सेठिया, सत्यप्रकाश जोशी, अन्नाराम सुदामा, चन्द्रप्रकाश देवल, रामेश्वरदयाल श्रीमाली, नारायणसिंह भाटी, मूलचंद प्राणेश, मोहन आलोक, सुमेरसिंह शेखावत, सांवर दइया, महावीर प्रसाद जोशी, नैनमल जैन, भगवतीलाल व्यास, यादवेन्द्र शर्मा चंद्र, रेवंतदान चारण, प्रेमजी प्रेम, अर्जुनदेव चारण, नृसिंह राजपुरोहित, करणीदान बारहठ, किशोर कल्पनाकांत, नेमनारायण जोशी, मालचंद तिवाड़ी, शांति भारद्वाज राकेश, वासु आचार्य, ज्योतिपुंज, अब्दुल वहीद कमल, भरत ओळा, संतोष मायामोहन, नंद भारद्वाज, चेतन स्वामी, लक्ष्मीनारायण रंगा, कुंदन माली, दिनेश पंचाल, रतन जांगिड़, मंगत बादल, अतुल कनक, आईदान सिंह भाटी।
नवनीतजी, अब बताइएगा आपकी सूची वाले वंचित नामों में से कौनसा नाम किसकी जगह होना चाहिए था? मतलब किसको अवार्ड न मिलकर किसको दिया जाना चाहिए था? क्या पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं की यह सूची आप पूरी की पूरी खारिज कर रहे हैं? या संशोधन चाह रहे हैं? खारिज तो कैसे? और संशोधन तो कौनसे, मतलब किसकी जगह कौन? 
हम आपके इस प्रत्युत्तर की बेसब्री में है। 
अब सवाल आपके सोच में अंतिम स्थान पर और हमारी सोच में पहले स्थान वाली बात पर-
हम तो बेबाकी से कह रहे हैं कि किसी भी भारतीय भाषा के सरकारी संस्थान के पास ऐसा उदाहरण नहीं होगा जैसा कि राजस्थान राज्य अकादमी के पास बिज्जी के बहाने है। नोबल नामांकित किसी भी भाषा का साहित्यकार अपने ही गृह राज्य की संस्था द्वारा सिरे से खारिज? मतलब अकादमी की स्थापना सन् 1983 से लेकर अब तक 200 से अधिक लोगों को पुरस्कार-सम्मान दिया जाना, और नोबल नामांकित, पद्मश्री सम्मानित बिज्जी का नाम ही नही आनां? आपको इसमें ‘दीन-हीन की तरह प्रस्तुत करना’ लगता है तो आपको पाकर राजस्थानी समाज धन्य है!! 
राज्य अकादमी द्वारा बिज्जी की अवहेलना होना पूरा भारतीय साहित्यिक समाज देख-महसूस रहा है। समय ही तय करेगा। 
मित्रों से आग्रह है कि इस जरूरी बहस को आगे बढाएं ताकि अकादमियों की दशा सुधर सके। रही बात, विवादित करने की- काम करने वालों पर लांछन लगते ही हैं। आजादी पाने वालों को देशद्रोह के मुकदमों में जेल जाना पड़ता ही है। परंतु समय उनका मूल्यांकन करता है। चुप रहने वालों का भी समय इतिहास लिखता है। 
यह अकादमी परिवेश में दासता के वातावरण से मुक्ति के साथ-साथ वेद-मुक्ति का आंदोलन भी है। 
यह सार्वकालिक है कि जातिवादी, गिरोहवादी अध्यक्षों की ओर से कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी अपने कुतर्क रखते हैं तथा खिलाफ बोलने वालों को व्यक्तिगत आरोपों के घेरे में लेते रहे हैं, भले ही वह राजनीतिक दल हों या फिर साहित्यिक दल। तो ऐसे में डरना क्या?
मुझे डर नही, तब ही तो बात के प्रारंभ में मैंने इसे ‘स्वस्थ बहस की शुरूआत’ कहा। मैं बात के रूप में और दस्तावेज के रूप में- सही कहने के लिए तैयार हूं। हो, बहस का सार्वजनिक मंचन!! अकादमी इतर माध्यम से नहीं, खुद खुलकर आए जवाब में? हां, बात तथ्ययुक्त हों, जिन्हें दस्तावेजों से भी साबित किया जा सके। नवनीतजी की भांति ‘गोडै घड़ेड़ी’’ नहीं हों। एक सज्जन ने कहां, किसी ने कहा, उसने कहा, विश्वस्त सूत्र के हवाले से, लोगों में चर्चा है आदि-आदि जुमले नहीं होने चाहिए।
स्वागत होगा अकादमी का......।।
-दूलाराम सहारण

Sunday, 18 August 2013

तो असल बात और पीड़ाएं ये हैं (संदर्भ राजस्थानी साहित्य अकादमी पुरस्कार विवाद)

तो असल बात और पीड़ाएं ये हैं (संदर्भ राजस्थानी साहित्य अकादमी पुरस्कार विवाद)

"कुछ नहीं, यह उन चंद लोगों की हताशा, निराशा है जिनके स्वार्थ, हितों की मंशा और मंसूबे अपनी झोलियां भर लेने के बाद भी और बहुत कुछ बटोर लेने के बाद भी आधे- अधूरे रह गए लगते हैं, यह राजस्थान साहित्य जगत और राजस्थानी रचनाकारों को शर्मसार करनेवाली वैचारिक निम्नता है और इसे जातीयता का रंग देना तो उस शब्द के साथ कृतघ्नता भी जिसके रचाव का ऎसे लोग प्रगतिशील होने का दम भरते हैं। 
               लगभग बीस बरसों केंद्रीय साहित्य अकादमी में काबिज़ श्वसुर, दामाद और उनके सरस्वती मानस पुत्र (जिनके लेखन के बारे में उनके घनिष्टतम साहित्यकार मित्र ने भरे मंच से कहा था ’इनका पता ही नहीं चलता ये किस भाषा के लेखक हैं और उन्हें अनुवादक रचनाकार के तमगे से नवाज़ा था) व उनकी सरपरस्ती में पलनेवालों की वर्चस्वता, सत्ता हाथ से निकल जाना उस समय ये नैतिकताएं, ईमानदारियां कहां थी जब इनके काल में (1) ऎसे राजस्थानी साहित्यकार अचानक अवतरित किए जिनकी जानकारी राजस्थानी साहित्य जगत और राजस्थानी के लेखकों को केंद्रीय साहित्य अकादमी से उस लेखक के नाम पुरस्कार घोषित होने पर ही पता चला.. सब ने आश्चर्य किया था..अरे! ये राजस्थानी के लेखक हैं, पहले कभी देखा- सुना तो नहीं। (2) ऎसी कृति को पुस्कार दिया गया जो एक वर्ष तो उस विधा में निर्णायक मंडल द्वारा उस विधा में खारिज़ कर दी गई लेकिन दूसरे वर्ष चूंकि कृति को नहीं, कृतिकार को पुरस्कृत करना था, उसी कृति को उसी विधा में पुरस्कार दिला दिया गया|"
जिन वरिष्ठ और युवा प्रतिभावान, योग्य रचनाकारों के चित्र दूलाराम सहारण पुरस्कार वंचितों का डॉयलॉग लगा फ़ेसबुक पर चस्पां कर राजनीतिज्ञों की तरह भावनात्मक सुहानुभूति बटोरने की कुचेष्टा कर रहे हैं, (चूंकि ये राजनैतिक पृष्ठभूमि से साहित्य के मैदान में आए हैं, इन से ऎसी अपेक्षा करना कोई आश्चर्य नहीं) ये प्रतिभाएं आज पैदा नहीं हुई, ये उस वक्त भी थीं, जब केंद्रीय साहित्य अकादमी में आप राजस्थानी के प्रतिनिधि थे तब आप के ये सच कहां थे, ये ईमानदारीयां और नैतिकताएं कहां छुपी थीं...राजस्थानी में कहावत है पूत के पग पालने दिखते हैं सो दूलाराम जी की अप्रतिम, विलक्षण प्रतिभा को केंद्रीय साहित्य अकादमी में दामाद, सरस्वती मानस पुत्र ने तुरंत पहचानते हुए मात्र एक महाविद्यालयी पुरस्कार की बिना पर उन्हें बरसों से राजस्थानी कलम घिस रहे राजस्थानी रचनाकारों पर वरीयता देते हुए न केवल राजस्थानी परामर्श मंडल में स्थान दिया, राजस्थानी भाषा का पहला  युवा पुरस्कार भी झोली में डाल कर इतिहास रच दिया। धन्य आपकी नैतिकताएं! धन्य आपकी ईमानदारियां!
                  समय परिवर्तनशील है, और एक स्वस्थ मन को इसे सहज भाव से स्वीकारने में कभी कोई संकोच, मलाल नहीं होना चाहिए.. ये सारी विकृतियां तभी उजागर होती हैं या की जाती है जब आप इसे स्वीकार नहीं करते। बीस- पच्चीस बरसों तक राजस्थानी साहित्य में केंद्रीय साहित्य में जो  होता रहा है, राजस्थानी में कलम चलानेवाले इससे अनजान नहीं है। जो हुआ, सब ने देखा है, जब- तब अपना विरोध भी जताया है और अब और आगे भी कुछ गलत होगा तो सच्ची कलम चुप नहीं रहनेवाली..पर ऎसे, इस निम्नता और मर्यादाएं लांघने की हद तक तो कतई नहीं... पुरस्कारों से कोई लेखक नहीं बनता, बनाता वरन अधिकतर तो यही देखा गया है कि पुरस्कारों नें लेखन का क्षरण ही किया है इसलिए ऎसे मामलों को वही लोग तूल देते हैं और गंभीरता से लेते हैं जिनके कुछ न कुछ हित, स्वार्थ पूरे होने से रह जाते हैं या सिध्द होने के बावजूद पेट नहीं भरते हैं। सच्चा रचनाकार तो अपने रचनाकर्म में ही रमा रहता है, पुरस्कारों-सम्मानों  की राजनैतिक और सैंटिगों से एकदम अनजान और परे। मिल गया तो वाह! नहीं मिला तो वाह! हां, पुरस्कारों- सम्मानों के सच, कहानियां सामने आने पर अचंभित होते हुए दुख जरूर महसूस करता है शब्द और शब्दकारों के चरित्र में होते ये क्षरण देख..अरे! ऎसा भी होता है! ऎसा कैसे हो गया?

ये उदगार मेरे नहीं राजस्थान के विभिन्न रचनाकारों से हुई सत्रों के बीच हुई अनौपचारिक बातचीत- चर्चा में थे जो राजस्थानी लोक साहित्य और संस्कृति पर केंद्रीय दो दिवसीय अकादमिक आयोजन में बीकानेर आए थे। अधिकतर वरिष्ठ रचनाकार सोशल मीडीया से जुड़े नहीं हैं लेकिन मीडीया जुड़े लेखकों से उन्हें समाचार सारे मिल रहे हैं और वे आश्चर्य चकित हैं.और इस सारी कहानी और प्रकरण पर एक वरीष्ठ रचनाकार ने हंसते हुए  बहुत ही कम शब्दों में एक राजस्थानी और एक हिन्दी कहावत में चुटकी ली, आप व्यासजी बैंगण खावै, दूजां परहेज बतावै... नौ सौ चूहे खा के बिल्ली हज़ को चली.....
  पुरस्कार विवाद में फ़ेसबुक पर झूठी वाह-वाही लूटनेवाले और शब्द की गरिमा से खेलनेवाले और उसे जातिवादी रंग देनेवाले और केंद्रीय साहित्य अकादमी  लगभग बीस- बाइस बरसों से राजस्थानी की ठेकेदारी संभाले हुए बताएं कि सन 1974 से 2012 तक के 39 उनतालीस बरसों में उन्होंने कितने सर्वहारा वर्ग के रचनाकारों को सम्मानित कराया.. इस सूची में सिर्फ़ एक अल्प संख्यक है और दलित तो एक भी नहीं  जब आप एक अंगुली किसी दूसरे की ओर उठाते हैं  बाकी अंगुलियों की दिशा देख लीजिया कीजिए। आप फ़ेसबुक पर जैसी सूचीयां जारी कर रहे हैं, उससे भी खतरनाक सूचीयां  केंद्रीय साहित्य अकादमी द्वारा अनादरित उन महान विभूतियों की है जहां राजस्थानी के नाम पर अपनी रोटीयां सेंकने वालों द्वारा अधिकतर उन्हें दुशाले ओढाए जाते रहे हैं जो इन  अनादरित व वंचित महान विभूतियों के कद के समक्ष कहीं नहीं ठहरते थे, क्यों कि सब अंदर के मामले थे। 

 राजस्थानी के इन सिरमौर रचनाकारों  पर  नज़रें इनायत नहीं हो सकी सिर्फ़ इसलिए कि वे  दरबारी नहीं बने और न ही कभी इसकी जरूरत समझी क्योंकि इनका लेखन सब पुरस्कारों से बड़ा था और है।
बरसों से सृजनरत राजस्थानी के ये वरिष्ठ रचनाकार पिछले बीस बरसों से केंद्रीय साहित्य अकादमी में राजस्थानी के कोकस से सैटिंग, समीकरण न बैठा पाने का फ़ल भुगत रहे हैं सबसे पहले लक्ष्मीकुमारी चूड़ावत (1984 में पदमश्री व अभी हाल ही में राजस्थान रत्न से सम्मानित), बैजनाथ पंवार, जहूर खां मेहर, रामस्वरूप किसान, मीठेश निर्मोही, भंवरलाल’भ्रमर’, ओम पुरोहित ’कागद’, पारस अरोड़ा, अस्त अली मलकान, माधव नागदा, श्याम जांगिड़, नागराज शर्मा, ओंकार श्री, तेजसिंह जोधा, भवानीशंकर व्यास’विनोद’, राम निवास शर्मा, कैलाश मंडेला, अंबिकादत्त, डा. किरण नाहटा, मदन केवलिया, हनुमान दीक्षित, देवकिशन राजपुरोहित, डा. मदन सैनी, बुलाकी शर्मा, बी.एल.माळी’अशांत’, कानदान कल्पित, डा.सत्यनारायण सोनी, ज़ेबा रशीद, मेहरचंद धामू, डा.नीरज दइया, रवि पुरोहित, दुष्यंत, डा. राजेश कुमार व्यास, मधुकर गौड़,  मनोज स्वामी, श्रीभगवान सैनी, पूरन शर्मा ’पूर्ण’, श्रीलाल जोशी, सूरजसिंह पंवार, पुष्पलता कश्यप, चांदकौर जोशी, शारदा कृष्ण, लीला मोदी के अलावा भी बहुत से ऎसे नाम हैं जिन्हें दुलाराम जी के शब्दों में कहें तो पुरस्कार के बिना भी इनकी लेखकीय ऊर्जा से राजस्थानी के पाठक अच्छी तरह से परिचित हैं।

                   यहां उन विलक्षण प्रतिभाओं का जिक्र भी प्रासंगिक होगा जो  केंद्रीय अकादमी के पुरस्कारों से ही अवतरित हुईं जिन में से कुछ के लेखक होने का पता तो उनके नाम पुरस्कार घोषणा से ही चला और कुछ की ऎसी कोई राजस्थानी कृति ही नहीं थी जिसका कि उल्लेख किया जा सके।

वे जो उपेक्षा और प्रतीक्षा में दिवंगत हो गए..
जनकवि हरीश भादानी, नानूराम संस्कर्ता, मोहम्मद सदीक, धनंजय वर्मा, निर्मोही व्यास, कन्हैयालाल भाटी, दुर्गेश आदि


और अंत में एक मित्रवत आग्रह - 

परम आदरणीय पद्मश्री, राजस्थान रत्न श्री विजयदान देथा हमारे राजस्थान और राजस्थानी के ही नहीं अपितु पूरे राष्ट्र के साहित्यिक और सांस्कृतिक धरोहर हैं अपने स्वर्णिम समय में उन्होंने जो किया, जैसे किया उसे किनारे रख दें तब भी यह सच है कि उन्होंने अपनी अप्रतिम भाषा, शिल्प और शैली में संपूर्ण राजस्थान के विभिन्न अंचलों में अपनी मेहनत और जीवटता से राजस्थानी लोक कथा संग्रह का ऎतिहासिक कार्य किया है जो कि हर नए राजस्थानी युवा हस्ताक्षर के लिए मिसाल ही नहीं, प्रेरणा स्रोत भी रहेगा, आज साहित्य में लेखकों की बाढ और पाठकों का अकाल का संकट समय है और एक- रचना लिख मारने के बाद आत्ममुग्ध हुआ जा रहा है। बिज्जी एक उदाहरण हैं.. ऎसे व्यक्तित्व को इस तरह,  इतना दीन-हीन की तरह प्रस्तुत करना निंदनीय और सर्वथा बिज्जी के उस स्वभाव के विपरीत है जिससे उन्हें जानने व पढनेवाले भलीभांति परिचित हैं। शेर बुढा जाने पर भी शेर ही होता है। अस्तु! 

Monday, 6 May 2013

साहित्य के पूँजीवाद से कब लड़ेंगे ? - गणेश पाण्डेय



उफ़! बेचारे अज्ञेय... सोचिए जरा.. उस अनंत विलीन में क्या सोच रहे होंगे? अपने शिष्यों और विरोधियों के बीच छिड़ी इस छिछालेदरी महाभारत पर.. अज्ञेय सीआईए  बनाम.. जैसे एक अघोषित मुकदमा हिन्दी साहित्य व वादों के ठेकेदारी हलकों में बिना मुलजिम इल्ज़ाम लगा तथाकथित वकीलों द्वारा लड़ा जा रहा है और सफ़ाइयां दी जा रही हैं यह भूलकर कि  बिना किसी वाद- विवाद एक लेखक होने के नाते एक लेखक के रूप में अज्ञेय जैसे लेखक की वह भी उनके जाने के इतने बरस बाद यूं कुत्ता घसीटी करना शब्द-साधकों के लिए शर्मनाक तो है ही साथ ही विचारणीय भी। हम भी लेखक हैं.. कहीं न कहीं किसी न किसी हित- अहित के साक्षी- सहभागी और कभी- कभी निर्णायक भी होते ही रहते हैं। जैसे आज अज्ञेय के गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं वैसे कल कोई हमारे भी उखाड़े ही गा। मेरे लेखक मित्रो! हमाम में हम सब नंगे हैं। इसलिए मैं तो कहना चाहूंगा  अगर आप में स्वस्थ बहस और शालीन भाषा प्रयोग में लाने का माद्दा नहीं तो ऎसे प्रकरणों को  समाप्त कर दिए जाने में कोई हर्ज़ बुराई नहीं है ऎसा न हो कि कल हमें हमारे लेखक होने पर शर्म आए। 

इस विषय पर आलोचना संज्ञान लेते हुए कवि, कथाकार, आलोचक गणेश पाण्डेय जी ने अपने फ़ेसबुक स्टेट्स में एक बहुत महत्त्वपूर्ण नोट लिखा है जिसमें उन्होंने जो तर्कसंगत मुद्दे उठाए हैं, उन पर हमारे शब्द समाज को गंभीरता से विचार- मंथन कर यह जांचने की जरूरत है कि हम क्या थे, क्या हैं और क्या होंगे अभी? वह नोट बीच बहस के पाठकों के लिए.... (साभार- गणेश पाण्डेय)



साहित्य के पूँजीवाद से कब लड़ेंगे ? - गणेश पाण्डेय


युवामित्रो द्वारा की जा रही एक अखबार के संपादकजी की तीव्र आलोचना ने ध्यान खींचा है। युवा मित्रों के हौसले के साथ हूँ। युवा ही नहीं बल्कि कुछ वरिष्ठ मित्र भी संपादकजी से असहमत हैं। एक मित्र ने अपनी पीड़ा को जरा तल्ख लहजे में रघुवीर सहाय के मुहावरे से ठीक ही कहा कि ऐसे ही रहा तो अमुक अखबार बच्चों के नम्बर दो के लायक रह जाएगा। एक युवामित्र ने  कहा  कि जैसे रोम के जलने पर वहाँ का शासक वंशी बजा रहा था, संपादकजी भी अपनी वंशी में लीन हैं। पता नहीं धुन में या वंशी में या दोनों में या किसी की याद में। एक अशोकजी हैं एक कमलेश जी हैं। ऐसे कई ‘जी’ साहित्य में सक्रिय हैं। यह ‘जी’ एक सामाजिक-सांस्कृतिक (एक अर्थ में राजनीतिक भी) संगठन के लोगों द्वारा अनिवार्य रूप से लगाया जाने वाला आदरसूचक एक विशेष पद है। संबोधन ही नही, कहीं भी उल्लेख करना हो तो रेल के इंजन की तरह श्री लगाने के बाद अंत में गार्ड के डिब्बे की तरह ‘जी’ जरूर लगता है। पर यही ‘जी’ प्रगतिशील मित्रों के हाथ लगते ही सिर्फ और सिर्फ एक औपचारिक आदर बन जाता है। जैसे नामवरजी। हृदय से सम्मान न भी करते हों तो दिखाने के लिए ही सही। हो सकता है कि बहुत से लोग संपादकजी का भी सम्मान सिर्फ दिखाने के लिए ही करते हों या इसलिए कि वे एक अखबार के संपादक हैं, इसलिए। वे संपादक न रहते तो कितने लोग किस तरह सम्मान करते, यह एक अलग विषय है। पर विनम्रतापूर्वक यह जरूर कहूँगा कि तब लोग उनके लिखे को देखकर करते। अशोकजी का न चाहते हुए भी लोग सम्मान इसलिए करते हैं कि उन्होंने बकौलखुद हजार से अधिक कविताएँ लिखी हैं, जैसे तेंदुलकर ने कई हजार रन बनाए हैं। वे एक बड़े अफसर थे, कई साहित्यिक संस्थाओं के प्रधान थे। पर क्या अपने समय के और अपने आसपास के लेखकों में उनका काम सबसे अच्छा है ? वे जितनी जगह घेरते हैं, सचमुच उतनी जगह के अधिकारी हैं ? मैं बहुत छोटा आदमी हूँ, बड़े संकोच के साथ यह कह रहा हूँ। पर जब कोई साहित्य की एक चली हुई दुकान हो जाएगा तो कुछ लोग तो उस दुकान के साथ रहेंगे ही। दरअसल साहित्य में ऐसी कई दुकानें हैं। सिर्फ अशोकजी ही क्यों , दो और भी हैं। 
                कुछ लेखक संगठन भी दुकान ही हैं। जब मैं दुकान कह रहा हूँ तो उन्हें छोटा नहीं बना रहा हँू बल्कि यह कह रहा हूँ कि जैसे दुकान अपने फायदे की बात सोचती है, इसी तरह यह लोग भी अपनी दुकान के फायदे की बात सोचते हैं। साहित्य में दोनों तरफ यही दुकानदारी है। खरीदने और बेचने का काम एक जैसा चलता है। संपादकजी भी किसी दुकान के से जुड़ गये हों तो कुछ गलत नहीं। आज देश की राजनीति में ही नहीं, साहित्य के देश में भी दबंगों और गिरोहोे का बोलबाला है। वहाँ लालबत्ती है तो यहाँ भी लालबत्ती बँटती है। सारा लफड़ा ही लालबत्ती का है। आप अगर किसी गिरोह में नहीं होंगे तो आपको पूछेगा कौन ? अकेले रहने का साहस जिसके भी पास नहीं होगा, वह इसी तरह के दरबारों के रत्न और उपरत्न बनने की कोशिश करेगा। मित्रो, मैं किसी का व्यक्तिगत रूप से असम्मान नहीं कर रहा हूँ बल्कि इस खतरनाक प्रवृत्ति की ओर इशारा कर रहा हूँ।   कई बार कह चुका हूँ कि यह गिरोहबंदी साहित्य के लिए नुकसानदेह है। इस गिरोहबंदी को बढ़ावा देने वाली चीजों में पुरस्कार और चर्चा है। कम काम करके भी अधिक मान-सम्मान पाने की लालसा भी पूँजीवादी सोच ही है। गैरवाम के लोग यह करें तो कह सकते हैं कि उनका रास्ता ही दूसरा है, हालांकि गलत वह भी है, पर वाम के लोग करते हैं तो हजार गुना अधिक गलत है। जब तक यह सब रहेगा तब तक एक नहीं हजार कमलेश आयेंगे-जायेंगे, हजार आजपेयी-वाजपेयी आते-जाते रहेंगे। मुद्दा सिर्फ सीआईए को मानवता के लिए जादू की छड़ी मानने का होगा या सीआईए के विरोध तक सीमित रहेगा तो साहित्य के जरूरी संघर्ष का मुद्दा कभी केंद्र में नहीं आएगा। आज साहित्य में सबसे बड़ा खतरा साहित्य के पूँजीवाद से है। पूँजीवादी संस्कृति से है। ठीक है कि आप सीआईए को मानवता के लिए वरदान मानने वालों की जमकर आलोचना करें। चोट पर चोट करें। पर यह साहित्य में कुछ बदलाव लाने वाली कोई निर्णायक लड़ाई नहीं हो सकती है। कुछ और भी सोचना होगा।     
               आज बड़े-बड़े संपादकजी लोग डरते हैं कि फलाना जी नाराज हो जाएंगे, इसलिए इसके साथ न दिखो, उसके साथ न रहो, यह न करो, वह न करो या कुछ लोग विरोध वहाँ करेंगे जहाँ पुरस्कार खोने का डर नहीं होगा तो इस तरह के डर हमेशा नुकसान साहित्य का ही करेंगे। एक संपादक चाहे जितना शक्तिशाली हो जाय, यदि उसके पास साहस नहीं है तो वह दो कौड़ी का है। एक लेखक चाहे जितना शोर मचाए लेकिन उसके पास पुरस्स्कर और चर्चा के भ्रष्ट पथ को तजने का साहस नहीं है तो उसकी सारी खुद की या सांगठनिक ताकत भी दो कौड़ी की है। असल बात सिर्फ साहस का है। साहस ही शक्ति की खोज करता है, शक्ति अर्जित करता है। शक्ति से साहस नहीं पैदा होता। जोड़तोड़ और तिकड़म में लगे हुए लेखक-संपादक साहित्य की इन मुश्किलों पर ध्यान देंगे तो साहित्य का भला होगा। पर यह तब होगा जब आप अपना नहीं, साहित्य का भला करना चाहेंगे। कहना यह है संपादकजी और उनसे भिड़ने वाले मित्र अ शोकजी और क मलेशजी के विवाद से आगे बढ़े। साहित्य की जरूरी लड़ाई तक पहुँचें। साहित्य का धंधा करने वाली सभी संस्थाओं और संगठनों और लेखकों का विरोध करें। जैसे संसद में दागी लोग पहुँच जाते हैं, उसी तरह साहित्य की संसदों में दागी और फर्जी लेखक पहुँच जाते हैं। जैसे कई पत्रकार दूसरे रास्ते से संसद में पहुँच जाते हैं, उसी तरह कुछ पत्रकार भी साहित्य की संसद में पहुँचने के लिए दूसरे रास्ते का इस्तेमाल करते हैं।      
                जरूरत आज इस बात की ज्यादा है कि साहित्य की सभी संस्थाओं को भ्रष्टाचार मुक्त करने, उसे अधिक लोकतांत्रिक, अधिक पारदर्शी बनाने के लिए काम करें। वैसे यह सिर्फ एक मामूली विचार है, जरूरी नहीं लोग जिस वाद-विवाद में लगें हुए हैं उससे आगे बढ़कर ऐसा कुछ सोचें या करें। मैं तो ऐसे ही कहता रहता हूँ।

गणेश पाण्डेय

Friday, 12 April 2013

क्रांति भी, रोना भी ,प्यार भी... -गणेश पाण्डेय

गणेश पाण्डेय

मित्रो! बीच बहस में आज प्रस्तुत है कवि-कथाकार, आलोचक गणेश पाण्डेय जी का फ़ेसबुक कवि-कविताओं को बारीकी से टटोलता एक विचारोत्तेजक किंतु महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक आलेख। उनके स्वयं के ब्लॉग पर यह आलेख आ चुकने के बावजूद  विषय की संवेदनशीलता,  सम सामयिकता और महत्त्व को देखते हुए बीच बहस में इसके पुन: प्रकाशन का मंतव्य मात्र यही कि यह अधिक से अधिक पाठकों तक पहुंच सके। दावा तो नहीं पर प्रयास तो किया ही जा सकता है।
गणेश पाण्डेय जी की  ’अटा पड़ा था दुख का हाट (कविता-संग्रह), जल में (कविता-संग्रह), जापानीबुखार (कविता-संग्रह), परिणीता (कविता-संग्रह), अथ ऊदल कथा(उपन्यास), पीली पत्तियाँ(कहानी संग्रह), आठवें दशक हिन्दी कहानी(शोधग्रंथ), रचना,आलोचना और पत्रकारिता(आलोचना) प्रकाशित  कृतियां हैं और वे  साहित्यिक पत्रिका ‘यात्रा’के संपादक हैं और वर्तमान में दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर के हिन्दी विभाग में प्रोफ़ेसर हैं। मोबाइल-09450959317.

क्रांति भी, रोना भी ,प्यार भी... -गणेश पाण्डेय

         आभासी दुनिया की हलचल हो या सचमुच की, कभी-कभी इन से दूर जीवन को बिल्कुल पास से देखने की इच्छा होती है। गहरे धँसकर जीने की इच्छा होती है। सच तो  यह कि कभी-कभी सिर्फ और सिर्फ दर्द को बारबार छूने की इच्छा होती है। ऐसा बहुत कम होता है। जब अखबार, टीवी और आभासी दुनिया के दर्द से बाहर... कुछ ठहर कर देखने की इच्छा होती है। आज अचानक स्वप्निल की सूई-धागा कविता को फिर से पढ़ने के बाद साझा करने की इच्छा हुई। पर बहुत से कवि तो दुनिया को बदल देने का काम हरहाल में आज पूरा कर लेने में लगे होंगे। स्वप्निल की इस ‘सूई-धागा’ का होगा क्या-
’तुम सूई थी और मैं था धागा
सूई के पहले तुम लोहा थी
धरती के गर्भ में सदियों से
सोई हुई

तुम्हें एक मजदूर ने अंधेरे से
मुक्त किया
उसी ने तुम्हें तराश तराश
बनाया सूई
ताकि तुम धागे से दोस्ती
कर सको

धागे के पहले मैं कपास था
जिसे मां जैसे हाथों से चुनकर
चरखे तक पहुँचाया गया
कारीगरों ने मुझे बनाया धागा

मैं अकेला भटकता रहा
और एक दिन मैं तुमसे मिला
इस तरह हम बन गये
सूई धागा
और साथ साथ रहने लगे

तुम्हारे बिना मैं रहता था
बेचैन
और मेरे बिना तुम
रहती थी अधीर

हम दोनों मिलकर ओढ़ते रहे
जिंदगी की चादर
और अपने सुख-दुख को रफू
करते रहे

एक दिन तुम मृत्यु के अंधेरे में
गिर गयी
मैं रह गया अकेला

जब भी मैं तुम्हारे बारे में
सोचता हूँ
तुम मुझे चुभती हो
आत्मा तक पहुँचती है
तुम्हारी चुभन।
(यात्रा 5-6)
             एफबी पर स्वप्निल श्रीवास्तव की इस कविता को यह जानते हुए दिया कि यह कविता एफबी के मिजाज की कविता नहीं है। यह कहना भी पड़ा कि मुझे ऐसा लगता है कि एफबी पर सक्रिय जिन कवियों के पास ऐसे काव्यानुभव या इस जमीन  की कविताएँ नहीं हैं, उन्हें यह कविता पसंद नहीं आयेगी। हिंदी कविता में हम जिसे बड़ी कविता कहते हैं, यह कविता चाहे उन अर्थो में सचमुच बड़ी  कविता न हो पर यह सच है कि यह कविता उस बड़ी जमीन की कविता जरूर है। यह बात मैं अपनी किसी कविता के लिए नहीं कह रहा हूँ। आज कविता को लेकर पसंद  का संकट है। क्या एफबी और क्या बाहर प्रिंट की दुनिया। हर जगह। दरअसल मैं जिसे विनम्रतापूर्वक पसंद का संकट कह रहा हूँ, वह समझ का ही संकट है।  कभी-कभी प्रिय-अप्रिय या मेरा-तेरा कवि व्यक्तित्व से जुड़ी पसंद समझ पर  भारी पड़ जाती है, यह भी सच है। खैर, यह कविता मुझे पसंद है। मेरी समझ भी  इस कविता के पक्ष में है। अच्छी बात यह कि कुछ मित्रों की भी पसंद और समझ  मेरी पसंद और समझ के साथ है। मैं एफबी और अखबार को अलग-अलग समझता हूँ। हालांकि अखबार में भी जो  रोज-रोज नहीं होता है, वह यहाँ होता है। इस माध्यम के चरित्र और स्वभाव  को लेकर कम जानता हूँ। इस माध्यम को बनाने और चलाने वाले लोग पूँजीवादी  हैं या समाजवादी या कुछ और, यह नहीं जानता हूँ। इस माध्यम का अर्थशास्त्र  और राजनीतिविज्ञान या समाजशास्त्र, कुछ नहीं जानता हूँ। कुछ-कुछ यह जानता  हूँ कि यहाँ अपने बारे में दिनरात अच्छी-अच्छी बातें करने वाले लोग हैं।
कुछ लोग दिनरात देश-दुनिया के बारे में अच्छी-अच्छी बातें करने वाले लोग  हैं। कुछ उम्र में बड़े हैं, कुछ मेरी उम्र के जेएनयू , जामिया और डीयू या बाहर के हैं और बहुत से मुझसे छोटे हैं। मेरे बेटे की उम्र के या मेरे शिष्यों की उम्र के। पर इनमें से जो साहित्य में काम करने वाले हैं, उनमें कई उम्र में छोटा होने के बावजूद कविता और आलोचना की दुनिया में अच्छा कर रहे हैं। ‘काफी’ इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि कुछ और न समझ लिया जाय। जाहिर है कि साहित्य की समझ अच्छी है, तभी इनका अच्छा काम है। कुछ  एफबीएफ दो-दो नाव पर एक साथ सवार हैं। दो-दो क्या, कई नावों पर एक साथ  हैं। कुछ हैं जो एक्टिविस्ट भी हैं और लेखक भी। कुछ पचास-पचास प्रतिशत हैं तो कुछ पचहत्तर और पच्चीस प्रतिशत। कुछ सिर्फ एक्टिविस्ट हैं। कुछ  ऐसे भी एफबीएफ हैं जो सिर्फ लेखक हैं। उनमें भी कुछ साधारण लेखक हैं, कुछ उससे बड़े। कुछ तो बहुत बड़े लेखक भी हैं। बहुत बड़े का मतलब जिसकी राजधानी की साहित्यसत्ताओं के निकटता या अंतरंगता हो। कुछ लेखकनुमा पत्रकार हैं, जो पत्रकारिता की दुनिया में साहित्य को लेकर व्याप्त भयंकर नासमझी और भष्टाचार से आँख मूंद कर ज्यादातर अच्छी-अच्छी बात करते हैं। लेखकों और आयोजनों के फोटो देते हैं। कुछ जेएनयू के पूर्व विद्यार्थी भी हैं, सचमुच ये बहुत प्रतिभाशाली हैं। प्रतिभाशाली तो ऐसे भी युवतर लेखक यहाँ हैं जो जेएनयू से नहीं हैं। बाहर से हैं। मुझे इनसे साहित्य संवाद अच्छा लगता है। ये साहित्य के बारे में बहुत अच्छी-अच्छी बात करते हैं। कुछ तो ब्लॉग भी चलाते हैं। घ्यान देने की बात यह कि ये ब्लॉग दिल्ली ही नहीं दिल्ली के बाहर से भी चलाते हैं और अच्छा चलाते हैं। ध्यान खींचते हैं। कुछ जोर-शोर से तो कुछ चुपचाप। ये अच्छा कर रहे हैं। अक्सर मेरा ध्यान अच्छे साहित्य पर चला जाता है। सच तो यह कि इसीलिए इस माध्यम पर आया भी हूँ। दूसरे लोग किसलिए आए हैं, नहीं जानता। सच यह पता नहीं कि वे टाइम पास के लिए आए हैं कि साहित्यिक चुटकुलाबाजी के लिए या राजनीतिक लतीफा सुनाने के लिए या सचमुच बड़े सामाजिक और राजनीतिक या साहित्यिक बदलाव के लिए ?
  इस माध्यम पर कविताएँ खूब पढ़ने को मिलती हैं। कुछ अच्छी और कुछ बहुत कमजोर। अधिकांश कविताएँ साधारण होती हैं। मेरा मानना है कि सिर्फ एक या कुछ खास कवि के यहाँ ही असाधारण कविताएँ अलग से पैदा नहीं होती हैं, तमाम कवियों की तरह इन्हीं साधारण कविताओं के क्रम में कुछ बहुत अच्छी कविताएँ बन जाती हैं। कुछ अविस्मरणीय कविताएँ हो जाती हैं। एक कवि का एजेंडा क्या होना चाहिए ? मेरी समझ से एक कवि का एजेंडा अच्छी कविता लिखना होना चाहिए। क्योंकि मेरा मानना है कि यदि आपका एजेंडा खराब कविता लिखना है तो आप कविता की दुनिया में आये ही क्यों ? ट्रक ड्राइवर होकर शेर कहने का लांगरूट तो खुला ही था। नहीं दोस्तो, अच्छी तरह जानता हूँ कि आप अच्छी कविता लिखने के लिए कविता के संसार में आए हैं। यह भी बहुत अच्छी तरह जानता हूँ कि आप सफर में हैं। मंजिल बस तनिक दूर है। हालाकि मुझे ही कौन अब तक मंजिल मिल गयी है। रास्ते में हम सब हैं। बस यह ध्यान रहे कि रास्ते में ट्रक ड्राइवर भी मिल सकते हैं, इसलिए जरा देख कर चलें। सामने खड्ड है। पहले तय कर लें कि पहले अच्छी कविता कि पहले राजनीतिक और सामाजिक क्रांति कि दोनों नावों पर एक साथ ? मैं बिल्कुल क्रांति के पक्ष में हूँ लेकिन सब एक साथ साधने की कला मेरे पास नहीं है। हाँ, कविता में सामाजिक और राजनीतिक बदलाव का स्वप्न तो देख सकता हूँ पर समाज में चुटकी या बंदूक बजाते हुए तुरत क्रांति हो जाने का सचमुच का स्वप्न नहीं देख सकता। क्योंकि मैं कोई सचमुच का एक्टिविस्ट नहीं हूँ। जब मैं बहुत छोटा था, मेरे कस्बे तेतरी बाजार में एक कॉमरेड हुआ करते थे, कॉमरेड दयाराम, उनकी बहुत इज्जत करता था। वे कहते थे अर्थात स्वीकार करते थे कि तोप का मुकाबला बांस से नहीं किया जा सकता है अर्थात समझ और विचार और सार्थक प्रतिरोध से किया जा सकता है। ऐसे जो भी साथी हैं, आदरपूर्वक उनके सामने नतमस्तक होता हूँ। पर शायद आज कुछ संकट यहाँ भी है। कुछ अच्छे साथी भी जरूर हैं। पर कुछ दूसरे तरह के साथी भी मिल सकते हैं। अभी एफबी पर मनीषा पाण्डेय ने अपने स्टेटस में लिखा है कि ‘मेरा एक ब्वायफ्रेंड था, धुर क्रांतिकारी। एक दिन उसने मुझसे कहा, मनीषा, तुम नौकरी करना और मैं पार्टी का होलटाइमर बन जाऊँगा। तुम एक -दो बच्चे पैदा करना। उनकी टट्टी साफ करना, उनके लिए रातभर जागना, उन्हें पढ़ाना-लिखाना। मैं तो महान कार्यों में लगा हुआ हूँ। जब पार्टी सम्मेलन होगा तो तो वहाँ भी तुम कढ़ाई-कलछुल लेकर तैयार रहना कॉमरेडों की सेवा करने के लिए। उस दिन मेरा दिल किया था कि तुरत बाहर का दरवाजा दिखाऊँ और बोलूँ- खबरदार जो इस तरफ कभी मुड़कर भी देखा। अब अगर क्रांति होनी ही है तो तुम नौकरी करना, मैं क्रांति करूँगी। तुम पूड़ियाँ परोसना, मैं भाषण दूँगी। चूल्हे में गए तुम और तुम्हारे विचार। बहुत उल्लू बना चुके तुम। अब हमारी बारी है।’  
मैं मनीषा जी तरह ऐसा कुछ तो नहीं कह सकता, पर इस खतरे की ओर इशारा जरूर करूँगा कि कविता की दुनिया में क्रांति के नाम पर ऐसे उल्लू बनाने वाले लोगों का आविर्भाव हो चुका है। ऐसे लोगों को मैं ही नहीं, कई एफबी मित्र भी, छद्म क्रांतिकारी कवि कहना अधिक पसंद करते हैं। क्योंकि ये साहित्य के बाहर हर उस जगह क्रांति चाहते हैं, जहाँ इनके लिए जोखिम रत्तीभर न हो। इनके पास साहित्य में सत्ता की चाकरी और बाहर की दुनिया को उलट-पलट देने का फर्जी स्वप्न होता है।  इनकी कविताओं में परिवर्तन का कानफाड़ू तीव्र राग और जीवन में धुर यथास्थितिवाद होता है। इनके लिए विचारधारा और ईमान मुक्तिबोध की तरह एक नहीं, दो है। दोनों एक-दूसरे के विरोधी। इन्हें क्या विचार नहीं करना चाहिए कि बाहर दूसरे देशों और भाषाओं के जिन क्रांतिकारी कवियों की कविताओं को अक्सर याद करते हैं, उनका जीवन भी ऐसा ही रहा है जैसा इनका है। मैं विनम्रतापूर्वक कहता हूँ कि बेशक उनकी तरह या उनसे भी अच्छी कविताएँ लिखो। बिल्कुल क्रांति की आला दरजे की कविताएँ लिखो, अच्छी कविताएँ लिखो और ऐसे दिखो जिससे तुम और तुम्हारी कविताएँ भरोसा पैदा करें बदलाव के लिए। तुम्हारा स्वप्न सच्चा लगे। तुम्हारी कविता की आत्मा से पुरस्कार की इच्छा की गंध न आए। ऐसे किसी कतार में मत दिखो। केशव तिवारी ऐसे छद्म क्रांतिकारी कवियों के लिए शायद ठीक ही कहते हैं कि सिंथेटिक कविताओं से इनका बाजार अटा पड़ा है। पर सुकून की बात यह कि यह ऐसे छद्म क्रांतिकारी कवियों की कविता का सच तो है आज की कविता का पूरा सच नहीं है। कई ऐसे घोषित तौर पर प्रगतिशलील कवि हैं जो छद्म प्रगतिशील नहीं लगते हैं। जिनके लिए कविता की चौहद्दी में जीवन की कविता और परिवर्तन की कविता दोनों शामिल है। आखिर स्वप्निल की कविता ‘सूई-धागा’ को एफबी की कई लेखिकाएँ और लेखक मित्रों ने क्यों पसंद किया है ? प्रेमचंद गांधी की प्रगतिशीलता यह कहते हुए खतरे में क्यों नहीं पड़ती है कि ‘ निश्चय ही यह एक शानदार कविता है...धरती के गर्भ से लेकर कपास के पौधे के शीर्ष तक और फिर मानवीय संबंधों की सघनतम संवेदनाओं को स्वप्निल जी ने बहुत धैर्य के साथ कहा है...मेरे अपने जीवनानुभव से इसमें कुछ और जोड़ा जा सकता है... लेकिन वह शायद इस कविता का अतिरिक्त विस्तार होगा...बचपन में कपास के पौधों और सूई-धागा-ताना-बाना देखने की अनेक स्मृतियाँ हैं...इस कविता ने उन्हें आँगन दिखाया है...’ आखिर यह प्रगतिशीलता जीवनानुभवों की विरोधी क्यों नहीं है ? यह प्रगतिशीलता सिर्फ किताबी या अखबारी क्यों नहीं है ? हमारे समय की कविता में कई कवि हैं जो जितने प्रगतिशील हैं, उतने ही लोकतांत्रिक और निडर भी।
                विनम्रतापूर्वक कहना चाहूँगा कि हमारे समय की कविता में कुछ ‘छद्म प्रगतिशील’ कवियों ने बहुत सारा कूड़ा-करकट कर रखा है। ऐसे आलोचकों ने भी गंदगी इकट्ठा करने का काम ही अधिक किया है। आभासी दुनिया में ही नहीं बाहर भी चालीस-पचास के आसपास के कई कवि -आलोचक भी ऐसा ही कुछ करते दिख जाते हैं। असल में काव्यालोचना की दिल्ली फैक्ट्री ने इतना कूड़ा इधर फैलाया है कि जहाँ देखो वहीं दुनिया को बदलने के नाम पर भूसाछाप ठस गद्यात्मकता का प्राचुर्य, विचारों का प्रकोप और मुँहदेखी प्रशंसा और जातिवाद और नये किस्म के काव्य संप्रदायवाद का खड्ड है। अपने लिखे पर अपनी कोई छाप नहीं है। लगता है कि जैसे किसी सेठ का बही-खाता ठीक करने वाले मुनीम हों। बाहर के कई आलोचकों ने भी इसी तरह की आलोचना की फ्रेंचाइजी ले रखी है। संतोष यह कि कुछ युवा कवि-आलोचक अपने समय की बुराई से अभी बचे हुए हैं। 
युवा कवि-आलोचक नीलकमल ने अभी हाल ही में एक युवा कवि की कुछ नकली कविताओं की ओर मेरा ध्यान खींचा है। यह अच्छी बात है कि कम ही सही पर कुछ कवि-आलोचकों की नजर इधर हिंदी में लिखी जा रही उन कविताओं पर है जिनमें हिंदी कविता की प्रकृति नहीं है। बल्कि बाहर से  आयातित  मुहावरे में लिखी जा रही हैं। जाहिर है कि ऐसी कविताओं को मैं नकली कविता कहता हूं। असल में नये कवियों में दो आने में चाँद खरीद लेने की तीव्र इच्छा ने उन्हें कुछ भी कर गुजरने के लिए विवश किया है। उन्हें पुरस्कार चाहिए, उन्हें अपने जीवनकाल में अमरत्व चाहिए। इसलिए सिर के बल कविता लिखने से भी परहेज नहीं। प्रायोजित इनाम और चर्चा के गठजोड़ ने भी इस तरह की नकली ही नहीं, दूसरे तरह की किताबी और अखबारी कविताओं के आधार पर भी तमाम शहरों के कमजोर कवियों को भी महानगर केशरी या रुस्तमे हिन्द जैसी रेवड़ियाँ बांटने का काम किया है। छोटे-छोटे शहरों के भ्रष्ट पुरस्कारों के लिए मचलते हुए कई कवियों की आत्ममुग्घ गद्गद मुद्राएँ आभासी दुनिया के पटल पर नित्य देखी जा सकती हैं। मेरे ही शहर का कविता का एक ‘सम्मान’ अर्थात पुरस्कार है, जिसे यहाँ पुरस्कारों का धंधा करने वाला एक आदमी निकालता है। न तो उसे साहित्य की कोई जानकारी है न समझ और न ईमानदारी। वह जैसे हाईस्कूल-इंटर के विद्यार्थियों को पानी चढ़ा गोल्डमेडल बाँटता है और व्यापारियों-डॉक्टरों इत्यादि को भी श्रमवीर और न जाने क्या-क्या पुरस्कार-सम्मान बाँटता फिरता है, उसी तरह कविता के साथ भी दगा करता है।
आशय यह कि जिसने सिर्फ ‘पुरस्कारों का धंधा’ कर रखा है, उसकी संस्था के पुरस्कार लेने में भी कथित प्रगतिशील कवियों की प्रगतिशीलता खतरे में 
नहीं पड़ती है, बल्कि साहित्य के भ्रष्टाचार के गले लगकर और पुष्ट ही होती है। यह भी संभव है कि ऐसे पुरस्कार लेने वाले प्रगतिशील लोगों को पुरस्कार की हकीकत ही न मालूम हो। मजे की बात यह कि अनेक शहरों में ऐसे तमाम पुरस्कारों के लिए चयनसमितियों में भ्रष्ट लेखक या लेखकनुमा या अलेखक लोग ही होते है। उनमें से किसी के भी पास मर्द लेखक का जीवन और छवि हो, ऐसा मुझे नहीं लगता। राजधानी से लेकर अनेक छोटे-बड़े शहरों में ऐसे ही भ्रष्ट प्रगतिशीलता का खेल जारी है। इस खेल में क्या प्रगतिशील और क्या गैर प्रगतिशील, सब एक साथ शामिल हैं। पर मेरा मानना है कि चोर की चोरी बाद में रोकना, पहले सिपाही को पकड़ो और उसकी तलाशी लो। जाहिर है कि मेरी बात उन्हें पसंद नहीं आएगी जो इस खेल में शामिल है या शामिल होने के लिए कतार में हैं।
दरअसल मैं कविता का एक साधारण कार्यकर्ता हूँ। कविता का लालबत्ती वाला मंत्री या अफसर नहीं। कविता का बिना दाम का मजदूर हूं। इसलिए पहले तो मैं साहित्य की दुनिया में बदलाव का स्वप्न देखता हूँ। मैं ऐसी बेवकूफी करने से खुद को रोकने की कोशिश करता रहता हूँ कि ऐसा स्वप्न  देखूँ या साहित्य का फ्रॉड करूँ कि साहित्य में तो सब जस का तस काला रहे और देश-समाज सब पलक झपकते बदल जाय। मैं इस पक्ष में भी नहीं हूँ कि शुरू से अंत तक कोई कवि सिर्फ क्रांति की कविताएँ ही लिखे और कुछ कविताएँ घर-संसार, प्रेम और प्रकृति इत्यादि की न हों। एकबार मेरे शहर के ही देवेंद्र कमार उर्फ बंगाली जी ने एक बिल्कुल शुरुआती युवा कवयित्री से कहा था कि जिस उम्र में हो उसमें क्रांति की कविता नहीं, पहले प्रकृति और प्रेम इत्यादि की कुछ कविताएँ लिखो। मित्रो, एफबी मित्रों से यह कहना कतई उचित नहीं है कि वे अपनी ‘हर कविता’ विचार और तात्कालिक मुद्दों पर केंद्रित न लिखें। कोई चाहे तो यहाँ मेरे कान उमेठ सकता है कि फिर मैंने ‘ओ ईश्वर‘ ‘गाय का जीवन’ ही नहीं बल्कि ‘जापानी बुखार’, और ‘सबद एक पूछिबा’ आदि लंबी कविताओं को क्यों लिखा ? नम्र निवेदन यह कि मित्रो सिर्फ यही नहीं लिखा है, बहुत कुछ इससे इतर भी लिखा है। आप भी अपनी ‘हर कविता’ को अर्थशास्त्र या राजनीति विज्ञान का रचनात्मक गद्य न बनाएँ।
अपनी ‘हर कविता’ को तरल संवेदना की जगह ठस अखबारी यथार्थ का कवितानुमा अनुवाद न बनाएँ। जीवन और अपने आसपास के लोगों के दिलों में भी झांकें, उनके मुस्कान और आँसू भी देखें। अरे बाबा अपने आँसू को भी खारा पानी समझ कर व्यर्थ में बहा न दें। उसे अपनी कविता में संभाल कर रखें। जैसे ‘सूई-धागा’ में है। जैसे मेरी ‘कहाँ जलाओगे मेरी देह’ में है, जैसे मेरी ‘‘प्रथम परिणीता’’ में है-

जिस तलुए की कोमलता से
वंचित है
मेरी पृथ्वी का एक-एक कण
घास के एक-एक तिनके से
उठती है जिसके लिए पुकार
फिर से जिसे स्पर्श करने के लिए
मुझमें नहीं बचा है अब
चुटकीभर धैर्य
जिसके पैरों की झंकार
सुनने के लिए
बेचैन है
मेरे घर के आसपास
गुलमोहर के उदास वृक्षों की कतार
और तुलसी का चौरा
जिसकी
सुदीर्घ काली वेणी में लग कर
खिल जाने के लिए आतुर हैं
चांदनी के सफेद नन्हे फूल
और
असमय
जिसके चले जाने के शूल से
आहत है मेरे आकाश का वक्ष
और धरती का अंतस्तल
तुम हो
तुम्हीं हो
मेरी प्रथम परिणीता
मेरे विपन्न जीवन की शोभा
जिसके होने और न होने से
होता है मेरे जीवन में
दिन और रात का फेरा
धूप और छांव
होता है नीचे-ऊपर
मेरे घर
और
मेरे दिल
और दिमाग का तापमान
अच्छा हुआ
जो तुम
जा कर भी जा नहीं सकी
इस निर्मम संसार में मुझे छोड़कर
अकेला
सोचा होगा कैसे पिएंगे प्रीतम
सुबह-शाम
गुड़
अदरक
और गोलमिर्च की चाय
भूख लगेगी तो कौन देगा
मीठी आंच में पकी हुई
रोटी
और मेथी का साग
दुखेगा सिर
तो दबाएगा कौन
आहिस्ता-आहिस्ता
सारी रात
रोएंगे जब मेरे प्रीतम
तो किसके आंचल में पोछेंगे
रेत की मछली जैसी
अपनी तड़पती आंखें
और जब मुझे देख नहीं पाएंगे
तो जी कैसे पाएंगे
कैसे समझाएंगे
खुद को
कैसे पूरी करेंगे जीवन की कविता
कैसे करेंगे मुझे प्यार
अच्छा हुआ
मीता
मेरी प्रथम परिणीता
छोड़ गयी मेरे पास
स्मृतियों की गीता
दे गयी
एक और मीता
परिणीता
जिसके जीवन में शामिल है
तुम्हारा जीवन
जिसके सिंदूर में है तुम्हारा सिंदूर
जिसके प्यार में है
तुम्हारा प्यार
जिसके मुखड़े में है तुम्हारा मुखड़ा
जिसके आंचल में है तुम्हारा आंचल
जिसकी गोद में है तुम्हारी गोद
कितना अभागा हूं
भर नहीं पाया तुम्हारी गोद
तुम्हारे कानों में पहना नहीं पाया
किलकारी के एक-दो कर्णफूल
तुम्हारी आंखों के कैमरे में
उतार नहीं पाया
तुम्हारी ही बालछवि
किससे पूछूं कि जीवन के चित्र
इतने धुंधले क्यों होते हैं
समय की धूल
उड़ती है
तो आंधी की तरह क्यों उड़ती है
प्रेम का प्रतिफल
दुख क्यों होता है
और
अक्सर
तुम जैसी स्त्री का सखियारा
दुख से क्यों होता है
तुम नहीं हो
तुम्हारी सखी है
है दुख है तुम्हारी सखी है
कर लिया है उसी से ब्याह
हूं जिसके संग
देखता हूं उसी में
तुम्हें नित।
(परिणीता)
इन कविताओं से भी अच्छी बहुत-सी कविताएँ हैं। ये तो कुछ भी नहीं, बहुत-सी ताकतवर कविताएँ हैं। बहुत से कवियों के पास ऐसी बहुत-सी कविताएँ हैं। यही जीवन है। यही संसार है। इसी संसार में क्रांति भी करना है, रोना भी है और प्यार भी करना है...


-गणेश पाण्डेय